"एक चिट्ठी भारत मां के नाम"
हे भारत माँ, मैं लौटूंगा,
शायद तिरंगे में लिपटकर,
या फिर तेरी मिट्टी की खुशबू बनकर,
पर लौटूंगा ज़रूर...
क्योंकि जब तूने मुझे गोद में खिलाया,
तेरे आँचल में बचपन आया,
तो कसम खाई थी माँ,
कि तुझसे पहले किसी और को माँ नहीं कहूंगा।
जब बूट मेरे पैरों में बंधे,
तो पाँव नहीं, इरादे भारी हुए,
जब बंदूक कंधे पर आई,
तो कंधे नहीं, जिम्मेदारियाँ बड़ी हुईं।
माँ, जब पहली बार गोली चली,
तो लगा दिल फट जाएगा,
पर याद आया, तूने कहा था —
"डर नहीं बेटा, तू भारत है, तू झुकेगा नहीं!"
आज सीमा पर खड़ा हूं,
ठंडी हवाओं के बीच तेरा नाम सीने से लगाए हुए,
माँ, मेरी बंदूक भी रोती है,
जब तेरे गीतों की धुन सुनती है।
कभी लगता है —
काश एक दिन तेरी गोदी में फिर सो पाऊं,
पर फिर सोचता हूं —
अगर मैं सो गया... तो तेरा जागना कौन संभालेगा?
माँ, अगर मैं ना लौटा...
तो मेरे नाम का दीप जलाना,
लेकिन आँखों में आँसू नहीं,
सीने में गर्व होना चाहिए!
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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