एक युग वो था, जब पृष्ठों में ही संस्कार बसते थे,
किताबें माध्यम थीं, और शब्द हृदय से निकलते थे।
न शोर था, न प्रचार था, बस संवाद का ही ज़रिया था,
संवेदना का भाव ही, कहने-सुनने का ज़रिया था।
भाषण तब भी मुखर थे, और तर्क की भाषा थी,
आलोचना का विचार था, न कि द्वेष की अभिलाषा थी।
तब निंदा का चलन न था, न कीचड़ ही उछाला जाता था,
सत्य को जीवन का सबसे, प्रबल शस्त्र माना जाता था।
एक अजब संकल्प था तब, अपनी कमियां स्वीकारने का,
साहस था खुद के चरित्र की, निर्बलता को उखाड़ने का।
जहाँ मिला अवसर, वहां अपनी भूल स्वीकार कर ली,
सत्य की वेदी पर खुद की, पूरी हस्ती मिटा दी।
किन्तु आज मीडिया का, एक चकाचौंध भरा मेला है,
जहाँ हर कोई वक्ता है, पर सुनने वाला अकेला है।
आज अपनी कमियों को, मुखौटों के पीछे छिपाया जाता है,
छवि को चमकाने की खातिर, निरंतर झूठ रचा जाता है।
सदा जवान दिखने की, एक कृत्रिम सी व्याकुलता है,
दिखावे की इस दौड़ में, अंतर्मन की शून्यता है।
वो पुराना व्यक्ति जो, निर्भय होकर सच कहता था,
जो अपनी कमियों को समाज के, सामने रख देता था
आज की चतुर दुनिया को, वो 'पागल' सा नज़र आता है,
क्योंकि आज सच छिपाना ही, 'महानता' कहलाता है।
अब आलोचना विलीन हुई, बस निंदा का ही शोर है,
ये सत्य का ज़माना नहीं, ये दिखावे का दौर है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







