"श्रृंगार रस से करुण रस तक की यात्रा"
पहले वादे थे चांद-सितारों के,
हाथों में हाथ लेकर कसमें खाईं थीं।
तूने कहा था "तुम बिन एक पल नहीं",
मैंने आँखों में अपने सपने सजाए थे।
पर सावन आया तो तू नहीं आया,
बादल गरजे पर तेरी परछाई नहीं।
तेरे नाम की चूड़ियाँ आज भी खनकती हैं,
पर तेरे पायल की झंकार अब कहीं नहीं।
कल तक जो मेरा चाँद कहलाता था,
आज वही गैरों की बाँहों में है।
जिस होंठों पर मेरा नाम था,
वही आज किसी और के गीत गाता है।
मैं छत पर भीगती रही सारी रात,
तू किसी और की छतरी तले था।
मैं तेरे खतों को सीने से लगाए रोई,
तू मेरे आँसुओं को मजाक समझा था।
इस दिल का क्या कसूर था?
जिसने सिर्फ तुझसे मोहब्बत की।
इस आँख का क्या गुनाह था?
जिसने सिर्फ तेरा ही सपना देखा था।
तूने तो बस खेला था,
मैंने तो जीवन दांव पर लगाया था।
तूने मोहब्बत को सौदा समझा,
मैंने हर सांस में तुझे बसाया था।
अब न शिकायत है न कोई गिला,
धोखा देकर तू भी खुश रहे।
मैं अपने टूटे सपनों को समेटकर,
फिर से खुद को जीना सीख लूँगी।
बारिश आती रहेगी, सावन जाएगा,
पर अब मैं कागज की नाव नहीं बहाऊंगी।
जिसने दरिया में डुबोया था एक बार,
उस दरिया के किनारे अब नहीं जाऊंगी।
वेदना ही शक्ति बन जाए,
जब प्रेम में विश्वास मर जाए।
टूटकर भी जो मुस्कुरा दे,
वही सच्ची प्रेमिका कहलाए।
रचनाकार — पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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