मौत क्या हैं।
मौत वो नहीं जो सांस के रूक जाने पर होती हैं।
मौत तो वो होती हैं जब अन्दर से आत्मा मर जाती हैं। जब कोई बात इस कदर हमें अंदर से खा रही होती हैं। और हम ना तो वो किसी को बता सकते है और ना ही जी सकते हैं।
क्यों जीना तो जैसे हम भूल से गए होते हैं। और वो एक हिस्सा जीवन का तब होता है। जब हम २५-३० के होते हैं। जैसे उम्र के उस दौर में हम ना तो जी रहे होते हैं और ना मर रहे होते है। जिम्मेदारी हमसे हमारी मुस्कान ही छिन लेती हैं और हम बस बिना थके बिना हारे चलते रहते है। और तब हमें ये भी नहीं पता होता हैं कि हमें मंज़िल मिलेगी या नहीं। जिम्मेदारी हमारे परिवार का ख़ुद का नाम और खुद को एक मुक़ाम पे लाने का अब तक जो मां -बाप हमारे ऊपर वारे है वो सब उनको ब्याज समेत लौटाने का। मां बाप जो हमें देते है हम उनको वो कभी भी नहीं दे सकते हैं। पर अपनी छोटी कोशिश से उनके चेहरे पे वो एक मुस्कान लाने का। और जब हम इस दौर में देखते हैं अपने पापा को रोज़ घर से बाहर जाकर काम करते हुए तो अंदर से जैसे हम मर से जाते हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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