"सभी पिता की चाह — एक बेटी के लिए"
हर पिता के सीने में, एक ख्वाब पलता है,
बेटी की डोली सजे, पर आँखें नम करता है।
हँसते-हँसते विदा करे, ये हुनर कहाँ से लाए,
जिसे उँगली पकड़ चलाया, उसे पराया कैसे बताए।
मैं राजा नहीं चाहता, ना महल-दुमहल माँगूँ,
बस ऐसा घर माँगूँ जहाँ, मेरी बिटिया रानी लगे।
सोने-चाँदी के गहने नहीं, बस इज़्ज़त का टीका हो,
उसकी आँख के आँसू पर, सारा परिवार रोता हो।
जो मेरी लाडो की हँसी को, अपनी किस्मत मान ले,
उसके टूटे ख्वाबों को, फिर से जोड़ने ठान ले।
थका हुआ चेहरा देखे तो, चाय खुद बना लाए,
बीमार पड़े तो माँ बनकर, रात भर सिरहाने बैठ जाए।
मैं दौलत नहीं देखता, बस नीयत परखता हूँ,
मेरी बेटी के मान-सम्मान की, कीमत समझता हूँ।
गाली की जगह गीत मिले, तानों की जगह त्यौहार,
ससुराल नहीं लगे उसको, दूसरा मायका इस बार।
मैं दामाद नहीं ढूँढता, एक बेटा ढूँढता हूँ,
जो कहे "चिंता मत करो पापा, आपकी बेटी राज करेगी।"
जो मेरे बाद भी उसका, बाप बनकर खड़ा रहे,
मेरी परछाई बनकर, हर दुःख से लड़ा करे।
हर पिता की बस यही चाह, यही दुआ, यही अरमान,
बेटी जहाँ भी जाए, वहाँ मिले उसको भगवान।
डोली हँसते हुए उठे, खुशियों से घर आंगन भर जाएं,
मेरा सपनों का राजकुमार, हर बेटी को ऐसा इंसान मिले।
क्योंकि बेटियाँ बोझ नहीं, बाबुल के आँगन की शान हैं,
जिस घर जाएँ रोशन कर दें, माँ-बाप का अभिमान है।
रचनाकार — पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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