रेंगकर भी बस तुझे सींचा,
अपनी आकृति में ढाली हूँ।
जीना सिखाई, चलना भी,
देख मैं पत्थर दिल नहीं हूँ।।१।।
तुझे रोते देख खुद रोई हूँ,
तुझे सोते देख खुद सोई हूँ।
तुझे हँसी दूं यही तो की हूँ,
पलकों में रख खुद हँसी हूँ।।२।।
मेरा मुन्ना बड़ा हो मुझसा,
देख मैं तेरे जीवन गति हूँ।
गोद में देख खुशी हो रही,
देख मैं पत्थर दिल नहीं हूँ।।३।।
नयनों में बसाया मानकर,
दिल से लगाया जानकर।
अपना बनाया मैं ठानकर,
मेरी उपज हो यह देखकर।।४।।
जब तूं हंसता तो मैं हंसती,
जब तूं खेलता तो मैं खेलती।
सीने से लगा दूध पिलाती हूँ,
देख मैं पत्थर दिल नहीं हूँ।।५।।
__ देवनन्दन कुमार, "बरहथिया".
सुपौल , बिहार। 30/07/2026.


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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