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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

इमरोज़ हम में भी है..?

..#Blog:) इमरोज़ हम में भी है..?


हां सही पढ़ा आज मैं आपको बहुत गहराइयों में उतरते हुए आपका इमरोज़ आपके समाने लाने का प्रयास करूंगी। जानती हूं आपके मन में सवाल होगा की आखिर इमरोज़ हे कौन? ये एक भारत के एक मशहूर चित्रकार, दृश्य कलाकार (Visual Artist) और कवि थे। पर इनको याद रखा जाता है इनके निस्वार्थ प्रेम से, इनको आज जानना जाता है,
इमरोज़ को महसूस करके पढ़कर जो मुझे समझ आया उसी का मूल निष्कर्ष आपके सम्मुख प्रस्तुत करती हूं।.... इमरोज़ वो इंसान हैं जो निश्छल मन, और इतना तटस्थता प्रेम की सारे पैमानों पर खरा उतरता हुआ,एक वास्तविक प्रेम को अभिव्यक्त किया है,इनका एक बहुत दिलचस्प सफर है, जिसमें इनका एक किस्सा बहुत सुंदर है,
इमरोज़ को अमृता प्रीतम जी से प्रेम था, और अमृता को साहिर लुधियानवी जी से फिर भी इमरोज़ को प्रेम की चरम प्रकाष्ठा पर साहिर साहब से कोई आपत्ती नही थी, इमरोज़ और अमृता 40 वर्षों तक एक साथ एक छत के नीचे रहें ... न कभी एक दूसरे को छूआ,न कभी प्यार की मुखबोली की, इमरोज़ बस एक दूर खंम्बे के पीछे छुपकर, अमृता को बस से आते जाते हर दिन देखते रहें,अमृता को प्रतिदिन बस में धक्का खाते देख उन्होंने एक एक रुपया जुटा कर एक स्कूटर लिया, और फिर अमृता प्रीतम जी को डेली छोड़ने और लेने जाया करते,अमृता को भी इमरोज़ से प्रेम था,पर साहिर साहब से वो तन मन से जुड़ी थी, फिर भी इमरोज़ कभी इस बात से जलन ईष्र्या नहीं हुई क्योंकि प्रेम यही है जो देना जानता हो,सहना जानता हो,

इमरोज़ के व्यक्तित्व की ख़ूबसूरती तब नज़र आती जब वो, अमृता को स्कूटर पर छोड़ने पर अमृता इमरोज़ की पीठ पर साहिर साहब का नाम अपनी अंगुलियों से लिखा करती थी, और इमरोज़ इस बात से एक प्रतिशत विचलित नहीं हुए क्योंकि निस्वार्थ प्रेम था,जो बस बिना उपेक्षाओं का था,इसी बीच जब अमृता की मुत्यू 2005 में हुई तो उन्होंने उसके पहले लिखा था इमरोज़ के लिए
शायद तेरे तखय्युल की चिनक बनके,
तेरे केनवास ते उतरगां,


फिर इमरोज़ अमृता को महसूस करते हुए लिखते रहे, इमरोज़ जैसा प्यार शायद कोई किसी को कर पायेगा, और हम सबको इमरोज़ जैसा इंसान चाहिए,पर क्या हम इमरोज़ नहीं बन सकते,सबसे महत्वपूर्ण बात तो ये है की हमारे इमरोज़ हमारे पास है साथ है,हम उसे देख न पा रहें, और वो है हमारे माता-पिता जो बिना किसी स्वार्थ से हमें प्यार करते हैं, हमारे इमरोज़ हमारे अपने हैं,जो हमें बहुत प्यार करते हैं, और बदले में कुछ नहीं चाहते ये होती है सच्ची मोहब्बत, निश्छल प्रेम, जिसमें उम्मीद शून्य,बस देना ही देना, स्वार्थ से परे एक धागा जिसे प्रेम कहते हैं,
*इससे पर मैंने दो लाइनों में इमरोज़ के प्यार को प्रर्दशित करने का प्रयत्न किया है:)
प्रेम तेरा हो या मेरा,
बस रूह का होना चाहिए।
वो झरना मोहब्बत का ,
हम पर बरसना चाहिए।

आज की सच्चाई यहीं है की जो हमारे पास है,उसे समय न देकर कहीं ओर किसी ओर में अपना इमरोज़ ढुंढ रहे हैं,मेरे मित्रों समय निकालों अपनों के लिए, अपने सपने के लिए,जीत जाने के लिए,हार जाने के लिए,समय निकालों जी भरकर हंसने के लिए, खुलकर रोने के लिए समय निकालों खुद को जानने के लिए,समय निकालों इमरोज़ को पढ़ने के लिए,समय निकालों लोगों को सुनना के लिए,
इसी कशमकश में आज वर्तमान परिदृश्य रिश्तों का सच विश्वास की टुटी तमन्नाओं पर अपना घर बनाये हुए है,
इसलिए आज ही ये पढ़ने के बाद अपने मां-बाप को गले लगना, उनको धन्यवाद देना की आप हमारे असली इमरोज़ हो,
इसी *के साथ दो लाइनों से मेरे शब्दों को विराम देती हूं,
प्रेम जो महसूस हो,वो भाव अब चाहिए,
हवाओं की नमी से अब,आग जलनी चाहिए

लेखिका कवयित्री नीतू नागर (अंबर) नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश




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