भीड़ से बाहर
विषय दर्शन:- भीड़ में नहीं है कोई इंसान, ना उसका समाज, उससे बग़ावत करने से जागृति आ जाती है।
"पहले तो आप लोगों की इस आदत को बदलिए कि हमारी बदनामी होगी, क्यों भाई जब देश में आप लोगों के बीच में भ्रष्टाचार जन्म ले लिया तो बदनामी नहीं हुई, बैंक में खाते खुलवाए थे कि बैंक में पैसा सुरक्षित रहें पर बैंक में जमा पैसा कट गया क्योंकि मिनिमम बैलेंस का भ्रष्टाचार है और किसी अधिकारी का घर पैसों से लथपथ है, क्यों ये क्या बदनामी नहीं है।
बात यह है कि भीड़ में सब डरे हुए लोग ही हैं, भीड़ में सब अकेले ही हैं, भीड़ में किसी को किसी पर भरोसा नहीं है, क्यों फिर भी भीड़ है। क्योंकि इससे बाहर निकलने पर सारी जिम्मेदारी खुद ही लेनी होगी, लड़ना होगा, संयम रखना होगा, अनजान फैसलों से गुजरना होगा, खुद को स्वीकार करना होगा, तभी से इंसान बनना होगा, उस समाज में आना होगा जो भीड़ से बाहर निकल आए और जिंदगी जीने लगे, कोशिश की और खुशी और मुस्कान के लिए कारण हटाया और सही सुख में जीने लगे।
भीड़ कुछ सही के लिए नहीं बनी बल्कि इसलिए बनी कि इसके बाहर जाएं, जो जाता है उसे भीड़ कोसते हुए धिक्कार देती है लेकिन भीड़ में जो एक एक प्राणी है वो खुश है कि और वो चाहता है कि ये भीड़ से बाहर जाए और हमें आमन्त्रित करें। जागृति की यात्रा शुरू करें, भीड़ नहीं चाहती पर भीड़ में जो एक है वो चाहता है, मतलब सब चाहते हैं लेकिन उस एक को कुछ देना नहीं चाहते, लेने को तैयार हैं, भीड़ भ्रमित हैं कि ये लोग क्या कहेंगे है उसका एक प्राणी ये ही कहता है, लेकिन सब एक आशा में तो है कि वो कौन करेगा, इस भीड़ से अब कौन बाहर निकलेगा जो इंसान बने और समाज बने और बढ़े।
इसलिए भीड़ से बाहर निकलो तो थोड़ा शांत रहो, जल्दबाजी नहीं, काम करो, और जिम्मेदारी वो पूर्णतः ले लो। वो काम मत करो कि एक लड़के पर पूरे परिवार का भार है, गलत है ये,जो जाग्रत है वो काम करें, जिम्मेदारी ले, डरें नहीं, सत्य बोलें, मजबूत रहें,
सम्मान से ज्यादा वास्तविकता देखें।"
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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