ये चेहरा भी ,अजीब, जंजाल में फंस जाता है
हंसते हंसते रोता है, कभी रोते-रोते मुस्काता है
सच्चाई दिल की अगर न कहने की लाचारी हो
बेचारा, स्वयं ही, स्वयं का ,मुखौटा बन जाता है
छल कपट, कुटिल झूठ की मंहगे खाद पानी से
ताजे फूलों के जैसा, खिलता खिलता जाता है
दिखावे की चाहत में, ऊंची शख्शियत के सामने
अपना हुनर लेकर, सामने सामने आ जाता है
मोह-माया, हंसी -खुशी, हार-जीत,खटी-पटी,
सारे धरम-कर्मों को, बेचारा अकेला निभाता है।।
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







