चलते-चलते
धूप ने जब
कंधों पर अपना भार रखा,
और रास्ते ने
थककर जैसे
चुप्पी ओढ़ ली—
तभी कहीं
पेड़ों के बीच से
झांकती मिली
थोड़ी-सी छांव।
वह छांव
कोई ठहराव नहीं थी,
न ही अंत—
बस एक सांस भर लेने का
मौका थी,
एक पल का सुकून,
जो फिर से चलने की
हिम्मत दे जाए।
जीवन भी तो
कुछ ऐसा ही है—
तपती धूप में
मंज़िल की तलाश,
और बीच-बीच में
मिलती रहती है
थोड़ी-सी छांव।
कभी वह
किसी अपने की मुस्कान में,
कभी
एक सच्चे शब्द में,
कभी
खुद से हुई
एक छोटी-सी मुलाकात में।
हम अक्सर
मंज़िल के पीछे
इतना भागते हैं,
कि इन छांव के पलों को
महसूस ही नहीं कर पाते।
पर सच तो यह है—
यही थोड़ी-सी छांव
हमें बचाए रखती है,
थकने से,
टूटने से,
और हार जाने से।
तो जब भी मिले
ये छोटी-सी राहत—
उसे थाम लो,
उसमें कुछ देर ठहर जाओ,
क्योंकि
यही पल
तुम्हें फिर से
खुद तक ले जाएंगे।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







