रास्ते चाहे उलझे हों,
खुद से रिश्ता निभाते जाना।
आईने जब सवाल करें,
सच से आँख मिलाते जाना।
भीड़ में खो जाओ अगर,
खुद को फिर भी बुलाते जाना।
रास्ते चाहे उलझे हों,
खुद से रिश्ता निभाते जाना।
कभी बनना तुम एक सवेरा,
अँधेरों को दूर भगाते जाना।
थके हुए मन के कोनों में,
उम्मीद के दीप जलाते जाना।
टूटे ख्वाबों के टुकड़ों से,
नया आसमाँ बनाते जाना।
रास्ते चाहे उलझे हों,
खुद से रिश्ता निभाते जाना।
जब शब्द भी साथ न दें,
खामोशी को गले लगाते जाना।
भीतर उठते तूफानों को,
धीरे-धीरे समझाते जाना।
हर दर्द को कविता करके,
दिल को हल्का बनाते जाना।
रास्ते चाहे उलझे हों,
खुद से रिश्ता निभाते जाना।
हार अगर दरवाज़े आए,
मुस्कान से उसे लौटाते जाना।
हर गिरावट के बाद फिर,
और ऊँचा उठते जाना।
अपने ही कदमों की आहट से,
हौसले नए जगाते जाना।
रास्ते चाहे उलझे हों,
खुद से रिश्ता निभाते जाना।
खुद में इतनी रोशनी रखना,
कि अँधेरा भी डर जाए।
अपनी पहचान के सूरज से,
हर साया भी झुक जाए।
तुम अपने ही हमसफर बनकर,
हर राह को सजाते जाना।
रास्ते चाहे उलझे हों,
खुद से रिश्ता निभाते जाना।
ज़िंदगी की इस भीड़ में भी,
एक कोना अपना बनाना।
जहाँ सिर्फ तुम हो, तुम्हारी धड़कन,
और सुकून का अफसाना।
वहीं बैठकर हर रोज़ थोड़ा,
खुद से मिलते जाना।
रास्ते चाहे उलझे हों,
खुद से रिश्ता निभाते जाना।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







