रक्त चूसते बनकर जोंक
डॉ.एच सी विपिन कुमार जैन" विख्यात"
रक्त चूसते ये देश के, बनकर के जोंक काले,
भवन खड़े करते अपनी, नींव में दबा के नाले।
अधिकारों की मंडी में ये, नीलाम करते ईमान,
जनता की आहों से भरते, अपने महलों के दालान।
सफेदपोशों के ये चेहरे, भीतर से काले कोयले,
देश की संपत्ति को लूटते, जैसे कोई लुटेरे टोले।
कायदे कानून की ये करते, अपनी मर्ज़ी से व्याख्या,
हर नियम को तोड़ मरोड़ें, नहीं किसी से इनको परवाह।
विकास की योजनाओं में, इनका ही हिस्सा मोटा,
जनता तरसे बूंद बूंद को, इनका भरा कटोरा खोटा।
कब तक सहेंगे ये अन्याय, कब फूटेगा ये लावा,
इन भ्रष्ट आचरण वालों का, कब होगा अंत बुलावा?
ये देश की प्रगति के दुश्मन, धीमा करते हर चाल,
अपनी जेबें भरने को ये, करते देश को कंगाल।
अब जाग उठो मेरे देश के वीरो, करो इनका प्रतिकार,
भ्रष्टाचार के इस दलदल से, करो भारत को उद्धार।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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