पथिक हूँ मैं—
रास्तों से मेरा पुराना रिश्ता है,
कोई मंज़िल स्थायी नहीं,
और कोई ठिकाना निश्चित नहीं।
चलते-चलते
पाँवों में छाले पड़ गए,
पर ठहरने की अनुमति
जीवन ने मुझे कभी दी ही नहीं।
पीछे मुड़कर देखता हूँ
तो धूल से ढके कुछ निशान हैं,
कुछ सपने अधूरे,
कुछ अपने अनजान हैं।
हर मोड़ पर उम्मीद खड़ी थी,
हर मोड़ पर एक परीक्षा भी,
मुस्कान ओढ़े रहा मैं
छिपाकर अपनी पीड़ा सभी से ही।
रातों ने ओढ़ा मुझे थकान से,
दिनों ने मांगा मुझसे धैर्य,
भीड़ में रहते हुए भी
अकेलापन बना रहा मेरा सत्य।
पूछता हूँ स्वयं से कई बार—
क्या यह यात्रा व्यर्थ है?
फिर भीतर से आवाज़ आती है,
चलते रहना ही तो जीवनार्थ है।
क्योंकि पथिक की व्यथा
रुकने से नहीं मिटती,
वह तो हर क़दम के साथ
और अधिक परिपक्व होती जाती है।
थक कर भी जो चल सके,
वही इतिहास रचता है,
पथिक का संघर्ष ही
मंज़िल को अर्थ देता है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







