परिंदों के पास,
उड़ने की हरकत है,
वो ऊंचाई को जानते हैं,
इसलिए सुबह को देखते हैं,
जगते हैं और उड़ जाते हैं,
जमीन से पंख फैलाकर आसमा बन जाते हैं,
उड़ना वो ज़मीन से सीखते हैं,
इसलिए शाम होते ही फिर जमीन पर आ जाते हैं,
वो उस पेड़ पर जो जमीन पर है,
परिंदे जानते हैं ऊंचाई के रास्ते,
आगे बढ़कर फिर रूककर,
अपने घर आते हैं,
वो ऊंचाई पर तो चढ़ते हैं,
लेकिन जमीनी रहते हैं,
ये ज़मीं ही उनका ज़मीर है,
वो लौट आते हैं,
अपनी सफलताओं को लेकर,
फिर ज़मीं पर फिर उस पेड़ पर,
यहाँ उनका घर और घोंसला है,
यहां उनकी खुशियां है,
वो आनंद को बांटने आते हैं,
ज़मीं उनकी हकीकत है,
जहां से पंख उड़ना सीखे,
गिरते ही हैं पर उसी ज़मीं पर,
संभालें तो वही है आखिर,
भोजन, पानी और चहचहाहट यहीं करती है,
अब इसके आगे और कितना आगे जाना है,
और कितना चाहिए,
यह भाव वो जानती है,
कि ऊंचाई कभी पार नहीं होती,
वो आगे बढ़ती है,
ऊंचाई पर कोई ठहर नहीं पाता,
ना वहां किसी का घर है,
हाँ बस अनुभव, संघर्ष और मेहनत करने की जगह,
ऊंचाई बस आगे बढ़ना सिखाती है,
आकाश छूने पर भी इसकी कितनी दूरी है,
कहाँ तक है, क्या कोई पार है,
यह सवाल परिंदे नहीं करते हैं,
जानते हैं जितना हम उड़ सकते हैं उड़ेंगे,
जितनी ऊंचाई मिलेगी स्वीकार करेंगे,
ज़मीर अपना पार नहीं करेंगे,
ऐसे प्राण नहीं जो यहीं सारा प्राण लगा दें,
वो लौटना जानते हैं,
इसलिए हकीकत में रहते हैं,
ऊंचाई पर जाने पर खो नहीं जाते,
खुद को होश में रखते हैं,
और फिर शाम को अपने घर आते हैं,
वो जानते हैं,
कि एक वक्त में कितना आगे बढ़ें,
ये ऊंचाई किसी की नहीं,
ये ज़मीं से पूछों,
जहाँ ऊंचाई उन्हें फिर उनकी ज़मीं गिरा ही देती,
फिर गिरे ज़मीं पर गिरे हुए ज़मीर से कौन रह पाता है,
ज़मीं ही हमें उठाती है,
और आगे बढ़ता लक्ष्य भेदी परिंदा बनाती है,
ज़मीं आगे बढ़ाती है, ऊंचाई दिखाती है,
साहस भरती हैं,
ऊंचाई पर पहुंचने पर पता चलता है,
कि जिस ऊंचाई पर हम पहुंचे हैं,
उस ऊंचाई से आगे फिर ऊंचाई है,
और अगर उस ऊंचाई को छू भी ले तो,
फिर ऊंचाई मिलती है,
हमारे सिर पर और एक ऊंचाई,
तब महसूस होना चाहिए कि ऊंचाई कभी पार नहीं होती,
क्योंकि जो पार है उसके भी कुछ पार है,
जो आगे है उसके भी आगे है,
जो बढ़ रही है बढ़ती जाती है,
पर हम वहाँ नहीं सोचते हैं,
जहाँ पहुँचते है, जहाँ कुछ पाते,
वहां हर वक्त अकेले होते हैं,
और रुकना नहीं हो पाता,
उसके बाद ऊंचाई चढ़ती जाती है बढ़ती जाती है,
ये हम सोचते जब हम ज़मीं पर होते हैं,
कि ज़मीं से जुड़े रहेंगे,
होता उल्टा है,
बस इसलिए हमारा जमीर हमें गिराता है,
ज़मीं हमारा ज़मीर पैदा करती है,
और वही ऊंचाई देती है,
ऊंचाई पर जाते है सबके साथ,
जैसे परिंदे करते हैं,
तब उनकी उड़ने की आदत,
हमें कला लगती है,
ज़मीं हमारा ज़मीर और ऊंचाई है,
वही आगे बढ़ने की प्रेरणा है,
ऊंचाई और ज़मीं के संतुलन में प्रेम हमारे ज़मीर में प्रवेश करता है,
और यह है जो पार करती है हमें,
संसार में जो कुछ है मूर्त, अमूर्त, चाहे शब्द या प्राण सब आगे बढ़ना, ऊंचाई छूना और पार करना चाहते हैं,
ये चाह ही सबकी उसके के मूल में आगे बढ़ती है, पार के पार जाती,
और ऐसे चलता है,
अनंत स्तर पर ऊंचाई रहती,
कुछ आगे बढ़ता जाता है,
कुछ पार होते जाता है,
खुदा, मैं, संसार या इनमें जो भी प्रक्रिया में है,
सब आगे बढ़ते हैं,
और वही बढ़ना और बढ़ता है,
ये सिलसिला रूकता नहीं है,
इसलिए हमें ज़मीं से जुड़ना चाहिए,
वो ज़मीं ही हमारा मैं,
पहचान, याद, फिज़ा सबकुछ है,
ज़मीं ही वो जीवन है,
जिस पर हम रहते हैं,
वो हमारी होती है,
हमें होना बाकी है,
ज़मीं के रहने ज़मीर ज़िंदा रख,
बाकी ऊंचाई को परिंदे जानते हैं,
जो है परिंदों के पास।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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