मेरे तराने गुनगुना रहे हैं अनवरत,
जिन्दगी की शामियाने में छिपकर।
कभी सामने से कभी ओझल होकर,
ये तराने झूठी भी नहीं, सच्ची है।
कभी चांद पर चढ़ने की जिद्द करती है,
कभी नफरत के चादर का पर्दाफाश।
यूं ही नहीं होती जीवन की परीक्षा,
कभी हाशिए पर बेमेल रहकर,
मेरे अफसाने नए बनते गए।
यही तराने गढ़ती है अफसाने को,
बेरंग होकर लौट आती आसमां से।
बयां करती किस्मत को आजमाने की,
किन्तु चांद तारे भी मुंह मोड़ लेते हैं।
रोज रोज नए किस्से बनते, बिगड़ते हैं,
एक नई आशा की किरण बनकर,
रोज सुबह सुबह दहलीज पर आकर,
मेरे खूबसूरती की जायजा लिए जैसे_
मेरे अफसाने नए बनते गए।
अब इस चकाचौंध दुनियां में,
मेरी जरूरत ही क्या रह गई है,
फिर भी यही तराने हैं जो गढ़ती है,
मेरी किस्मत की हर दीवार को,
एक बड़ी लकीर खींच देती है।
लाचार हूँ, मजबूर हूँ, मैं क्या कहूं आपसे,
पर दिल में सुकून की लहर दौड़ रही है,
इसी तराने के बदौलत आज भी,
मेरे अफसाने नए बनते गए।
मैं हारकर भी जिद्द पकड़ बैठा हूँ,
सामने से आकर हर कोई मुझसे,
मेरी परछाई से बात कर लेता है।
एक मैं हूँ जो नया मुसाफिर बनकर,
हर किसी की बाट जोहता रहता हूँ।
लेकिन मेरी सूरतेहाल ही कुछ ऐसी,
हकीकत पर हर शख्स मजा लेता है।
हर रोज का आखिरी पन्ना उलटकर,
मेरे अफसाने नए बनते गए।
मैं न कुछ छिपाता हूँ, अन्दर में,
जो भी मेरा अपना है, सहज ही दिखाता हूँ।
लोग दिलवाले जरूर हैं, खुलते नहीं हैं,
न बेधड़क कहते, न बेकसूर कभी रहते।
चापलूसी की जुगत में दिन रात लगे रहते,
हरेक की जीवन तराने गुनगुनाते रहते,
लेकिन उसे दबाकर बस मौन ही रहते।
मैं औरों की अफसाने गिना रहा था.....
हवा बदली, मेरे अफसाने नए बनते गए।
__देवनन्दन कुमार, "बरहथिया".
किशनपुर, सुपौल (बिहार).
02/08/2026.


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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