""यादों में करवटें रोई है
दिल से निकलकर धड़कनें रोई है,
साँसे नरम है क्या आहें भरूं,
तेरे बिना ग़म क्या करूं,
दर्द नसीबी में क्या कम है,
आँसुओं से भी नजरें खो गई मैं,
रातों में अनाथ हो गई मैं,
यादें मुझे भुलाती ही जाए,
इक दिल से तन्हां हो गई,
सपनों की सतह में भी नहीं हूं मैं,
दर्द बिना भी दिल कैसे रह जाएं।
आंखों में डूबी है शामें,
रात का आलम भी गया क्या कम है,
सांसें थी कम हो गईं,
मरना था अनबन हो गई ,
पहली बार ही दिल खो गई मैं,
सीली-सीली राख सी हो गई मैं
रेत की तरह मेरी जिंदगी थी जो पल पल में फिसलती जाएं,
एक पल भी उनकी नजर कहां थी जो मेरे दिल को भी ना रखने आए,
साथ क्या मैं निभाऊं जब साथी ही अकेला हो जाए,
बैठा हूं चीथड़ों पर , पल रहा हूं ग़म की छांव पर,
कैसे कैसे मिलन की रीत गई रे,
दिल बिना भी हाल बाजारों में जी रहा है, तेरे बिना भी क्यों आँसू आएंगे,
आँखों में बैठी है तन्हाई,
तेरी नज़रों में क्या ग़म है,
साँसों को डर तेरा,
तेरी बातों का घुलने का असर है,
दिल का करीब आना क्या तुझमें भी यही असर है,
अकेली है तन्हाई जिसके साथी की गुमनामी की ख़बर है,
अपनी तो बेवफाई रूठें बाजारों में बिक रही है,
होने दो जो होना है,
मिलकर भी तो खोना है,
यही रात मैंने बिगाड़ी उजाले में,
दिल के बाहर भी,
मेरा वजूद मिलना बाकी है,
तेरे बिना भी दिल बस जी रहा है।।""
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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