पैदा हुए हैं तों अनचाहा जीवन भी जीना पड़ेगा
ख़ुशी न सही ग़म ही सही कुछ तों बुनना पड़ेगा
औरत ज़ात भी तूने बनाई मुक़द्दर भी तूने लिखा
मेरी ख़ता क्या हैं क्यूँ सबका ताना सुनना पड़ेगा
तूने इम्तेहान लेने में ज़्यादती करदी मेरे मालिक
थक हारकर आखिर मुझे मौत क़ो चुनना पड़ेगा
घाव गहरे थे वक़्त ने भरने की जगह सड़ा दिया
अब क्या,ज़िस्म क़ो रफ्ता-रफ्ता सुलगना पड़ेगा
काश दुआ सबकी कबूल हों मैं युहीं गुज़र जाऊँ
बहुत पत्थर हों लिए अब रेत सा बिखरना पड़ेगा
न मुहब्बत मयस्सर हुई न सुकूँ हमारा हुआ कृष्णा
पऱ मालिक ने जितना दाना दिया हैं चुगना पड़ेगा..
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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