ओ संवेदनहीन मनुष्यो!
उठो!
देखो…
तुम्हारी दृष्टि में
कितने सूर्य
बेनूर पड़े हैं।
कितनी करुणाएँ
निर्वासित हैं
तुम्हारी धड़कनों के
खंडहरों में।
कितनी प्रार्थनाएँ
बिना उत्तर के
तुम्हारी चौखट से
लौट गई हैं।
तुम्हारी चुप्पियाँ
कितने रुदनों का
कफ़न ओढ़े
चल रही हैं।
ओ संवेदनहीन मनुष्यो!
एक बार सुनो…
जो अब तक
तुम्हारी आत्मा के
तहख़ाने में
ज़ंजीरों से बँधा है।
सुनो…
कि किसी अनजान की आह
सिर्फ़ हवा नहीं होती,
वह ईश्वर का
अधूरा वाक्य भी होती है।
कहो…
जो अब तक
तुम्हारी पलकों के
मरुस्थल में
दफ़्न पड़ा है।
कहो…
कि दया
अब भी
तुम्हारी नसों में
अपना घर तलाश रही है।
इस मरघट होती सभ्यता में
अपनी करुणा का
दीपोत्सव रचा दो।
अपने स्पर्श का
चुम्बन जड़ दो
हर ठिठुरती आत्मा पर।
अपने शब्दों का
अमृत टपका दो
हर बंजर पड़ती आशा पर।
अपने हृदय का
उजास रख दो
हर बेनाम अँधेरे के माथे पर।
ओ संवेदनहीन मनुष्यो!
लौट आओ…
इससे पहले कि
उपेक्षाएँ
मनुष्यता का
श्राद्ध लिख दें।
सुविधाएँ
संवेदनाओं की
समाधि बन जाएँ।
और
तुम्हारी धड़कनों में
रक्त नहीं,
सिर्फ़
निर्लज्ज सन्नाटा
बहने लगे।
ओ संवेदनहीन मनुष्यो!
जगा दो
वह एक बूँद
जो अब भी
करुणा कहलाती है।
बचा लो
वह एक स्पंदन
जो अब भी
मनुष्य कहलाता है।
इससे पहले कि समय
तुम्हारे अस्तित्व पर
अंतिम धूल डालकर
इतना ही लिख दे—
“यहाँ देह तो जीवित थी,
पर हृदय का अंतिम संस्कार
बहुत पहले हो चुका था।”


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







