न जाने कितनी सजाएं गुजर गईं ज़माने में
हकीकते-जुर्मे-दिल ,शायद मर गईं ज़माने में।
सजग नारी शक्तियां भी,शिकार में फंसा ली गईं,
नराधम के पंख इतनी ज्यादा पसर गईं ज़माने में।
सभ्य नारियां होतीं हैं,हर "ट्विशा" के घर में,
क्या इनकी ममता भी, बिखर गईं ज़माने में।
"हरण" और "चीरहरण" ने नारियों को वंदनीय बनाया,
आखिर क्यों नरांतस में नाइंसानियत भर गई ज़माने में।
विडंबना है कि बुद्धिमान ही बुद्धिहीन हो गये हैं,
शिक्षा और सभ्यता भी इतनी डर गईं ज़माने में।।
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







