बेमुरव्वत थे हम अब हमें मुरव्वत भी आने लगी
तुझें देखा तो फिर ख़ुद की सूरत भी भाने लगी
ज़ब न थी चाहत तो वो हर दफ़ा आस-पास थे
करने लगे चाहत तो मुहब्बत भी आज़माने लगी
गुरुर था हमारी अना पऱ ये राम की दी दौलत हैं
इश्क़ हुआ तो पास रखी दौलत भी सताने लगी
तुझें भले मेरी हसरत नहीं पऱ हम ठहरे मजबूर
क्या करे दिली घर क़ो मुहब्बत भी ढहाने लगी
आज़ बैचेन हुए तुम तो तस्सली हुई हैं दिल क़ो
तेरी बढ़ती बैचैनी मेरी मुहब्बत क़ो बढ़ाने लगी
कृष्णा के बस में नहीं तेरें दर पऱ दम तोड़ सके
तुझें क्या ख़बर तेरी तलब कितना तड़पाने लगी..
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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