दरवाज़े पर दस्तक हुई,
आवाज़ में आग्रह भारी था,
कहने को वो मदद माँग रहा था,
पर लहज़ा कुछ ज़्यादा ही ज़रूरी था।
बार-बार एक ही बात—
“आपको तो करना ही होगा”,
जैसे मेरी चुप्पी को
उसने मेरी हाँ समझा होगा।
मैंने धीरे से कहा—
“हालात मेरे भी आसान नहीं,
मैं भी लड़ रही हूँ ज़िंदगी से,
मेरे सपने भी अनजान नहीं।”
“मैं एक माँ हूँ,
और इस वक्त बस एक सहारा हूँ,
अपनी बेटी की शादी की
हर ज़िम्मेदारी का किनारा हूँ।”
“हर सिक्का जोड़ा है मैंने,
हर ख़्वाब सँवारा है,
अपनी खुशी से पहले
उसका भविष्य निखारा है।”
वो चुप सा खड़ा रह गया,
शायद पहली बार समझ पाया—
हर ‘ना’ के पीछे भी
एक पूरा संसार छुपा होता है।
मदद करना फ़र्ज़ सही है,
पर हर फ़र्ज़ की एक सीमा होती है,
कभी-कभी ‘ना’ कहना भी
अपनी जिम्मेदारी की ही रीति होती है।
प्रो. स्मिता शंकर सृजना


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







