मेरी प्यारी सखी, तू ऐसी क्यों लगती है?
हर दुख के मौसम में भी हँसती क्यों लगती है?
कल तक जो अपनों की ठोकर गिनती थी,
अब अपनी राहों में मस्ती क्यों लगती है?
जिसको सबकी चिंता ने बूढ़ा कर डाला था,
उसके चेहरे पर फिर से बचपन क्यों खिलती है?
जो हर रिश्ते की नाव अकेली खेती थी,
अब डूबे तो डूबे, कहती क्यों दिखती है?
मेरी प्यारी सखी, तू कौन-सा पाठ पढ़ी?
सूखी डाली पर भी कैसे हरी-भरी खड़ी?
वो बोली—
“जिनको मेरी कद्र नहीं थी, जाने दिया,
अपने हिस्से का सूरज मैंने पाने दिया।”
“हर दरवाज़े पर माथा रगड़ना छोड़ दिया,
बंद खिड़कियों से उम्मीदें जोड़ना छोड़ दिया।”
मेरी प्यारी सखी, तू बदली-बदली लगती है,
बिन पायल के भी अब छम-छम चलती लगती है।
वो बोली—
“अब हर बात पे दिल को घायल करती नहीं,
बिन माँगे अपनी कीमत कम करती नहीं।”
“जो जैसा है, वैसा ही रहने देती हूँ,
अब सबको आईना बनने देती हूँ।”
मेरी प्यारी सखी, ये कैसा तेरा रंग हुआ?
रोता हुआ समंदर कैसे उमंग हुआ?
वो बोली—
“आँसू को मैंने आँखों का गहना कर डाला,
टूटे सपनों को जीने का जरिया कर डाला।”
“जिनसे घाव मिले थे, उनको धन्यवाद दिया,
काँटों ने ही फूलों का असली स्वाद दिया।”
मेरी प्यारी सखी, अब राज़ बता भी दे,
इस मतवालेपन का अंदाज़ बता भी दे।
वो हँसकर बोली—
“न कोई जाम पिया है, न कोई भंग घुली,
बस खुद से मिलने की एक राह नई खुली।”
“अब दुनिया को खुश करने की बीमारी गई,
तभी तो चेहरे पर ये मीठी खुमारी आई
लोग समझे मतवाली हूँ, ये उनकी भूल रही,
मैं तो बस अपनी होकर पहली बार फूल रही।”
मेरी प्यारी सखी, अब समझ में आया है,
तू नशे में नहीं—
खुद की नज़रों में ऊँची हो पाई है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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