Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat


Show your love with any amount — Keep Likhantu.com free, ad-free, and community-driven.

Show your love with any amount — Keep Likhantu.com free, ad-free, and community-driven.



The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

मेरी प्यारी सखी

मेरी प्यारी सखी, तू ऐसी क्यों लगती है?
हर दुख के मौसम में भी हँसती क्यों लगती है?

कल तक जो अपनों की ठोकर गिनती थी,
अब अपनी राहों में मस्ती क्यों लगती है?

जिसको सबकी चिंता ने बूढ़ा कर डाला था,
उसके चेहरे पर फिर से बचपन क्यों खिलती है?

जो हर रिश्ते की नाव अकेली खेती थी,
अब डूबे तो डूबे, कहती क्यों दिखती है?

मेरी प्यारी सखी, तू कौन-सा पाठ पढ़ी?
सूखी डाली पर भी कैसे हरी-भरी खड़ी?

वो बोली—

“जिनको मेरी कद्र नहीं थी, जाने दिया,
अपने हिस्से का सूरज मैंने पाने दिया।”

“हर दरवाज़े पर माथा रगड़ना छोड़ दिया,
बंद खिड़कियों से उम्मीदें जोड़ना छोड़ दिया।”

मेरी प्यारी सखी, तू बदली-बदली लगती है,
बिन पायल के भी अब छम-छम चलती लगती है।

वो बोली—

“अब हर बात पे दिल को घायल करती नहीं,
बिन माँगे अपनी कीमत कम करती नहीं।”

“जो जैसा है, वैसा ही रहने देती हूँ,
अब सबको आईना बनने देती हूँ।”

मेरी प्यारी सखी, ये कैसा तेरा रंग हुआ?
रोता हुआ समंदर कैसे उमंग हुआ?

वो बोली—

“आँसू को मैंने आँखों का गहना कर डाला,
टूटे सपनों को जीने का जरिया कर डाला।”

“जिनसे घाव मिले थे, उनको धन्यवाद दिया,
काँटों ने ही फूलों का असली स्वाद दिया।”

मेरी प्यारी सखी, अब राज़ बता भी दे,
इस मतवालेपन का अंदाज़ बता भी दे।

वो हँसकर बोली—

“न कोई जाम पिया है, न कोई भंग घुली,
बस खुद से मिलने की एक राह नई खुली।”

“अब दुनिया को खुश करने की बीमारी गई,
तभी तो चेहरे पर ये मीठी खुमारी आई

लोग समझे मतवाली हूँ, ये उनकी भूल रही,
मैं तो बस अपनी होकर पहली बार फूल रही।”

मेरी प्यारी सखी, अब समझ में आया है,
तू नशे में नहीं—
खुद की नज़रों में ऊँची हो पाई है।




समीक्षा छोड़ने के लिए कृपया पहले रजिस्टर या लॉगिन करें

रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (2)

+

इक़बाल सिंह “राशा“ said

शारदा जी
बहुत सुंदर और आत्मसम्मान से भरी रचना है दर्द से आत्मबोध और परनिर्भरता से आत्मनिर्भरता तक का सफ़र बेहद प्रभावशाली ढंग से उभरता है। खासकर “बस खुद से मिलने की एक राह नई खुली” और अंतिम भाव पूरी कविता को एक सुंदर, सशक्त निष्कर्ष देते हैं।
बहुत खूब आपको सादर प्रणाम

सरिता पाठक said

दो सखियो का बहुत ही सुन्दर वार्तालाप आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता से भरी रचना, अति सुन्दर 👌श्रद्धा बहन को सादर प्रणाम 🙏🙏

कविताएं - शायरी - ग़ज़ल श्रेणी में अन्य रचनाऐं




लिखन्तु डॉट कॉम देगा आपको और आपकी रचनाओं को एक नया मुकाम - आप कविता, ग़ज़ल, शायरी, श्लोक, संस्कृत गीत, वास्तविक कहानियां, काल्पनिक कहानियां, कॉमिक्स, हाइकू कविता इत्यादि को हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, उर्दू, इंग्लिश, सिंधी या अन्य किसी भाषा में भी likhantuofficial@gmail.com पर भेज सकते हैं।


लिखते रहिये, पढ़ते रहिये - लिखन्तु डॉट कॉम


LIKHANTU DOT COM © 2017 - 2026 लिखन्तु डॉट कॉम
Designed, Developed, Maintained & Powered By HTTPS://LETSWRITE.IN
Verified by:
Verified by Scam Adviser
   
Support Our Investors ABOUT US Feedback & Business रचना भेजें रजिस्टर लॉगिन