महाकाल जाने पर
मनुष्य मंदिर नहीं पहुँचता,
वह अपने भीतर
सदियों से बंद पड़े
एक दरवाज़े तक पहुँचता है।
जहाँ
पछतावे चमगादड़ों की तरह
उल्टे लटके रहते हैं,
और स्मृतियाँ
बिना हवा के भी
सूखे पत्तों-सी
खड़खड़ाती रहती हैं।
महाकाल की देहरी पर
अहंकार
बर्फ़ का पहाड़ नहीं,
सुबह की धूप में काँपती
ओस की बूँद बन जाता है।
एक किरण पड़ती है…
और वर्षों का “मैं”
बिना आवाज़ किए
आकाश में विलीन हो जाता है।
वहाँ जाकर समझ आता है—
दर्द कोई अँधेरा नहीं,
वह तो धरती की कोख है,
जहाँ हर आँसू
एक बीज बनकर
अदृश्य जड़ों में बदलता रहता है।
जो सबसे अधिक रोया है,
वही सबसे अधिक
हरियाली बनकर उगा है।
महाकाल के सामने
मन
एक पुरानी हवेली होता है—
जिसकी दीवारों में
बचपन की हँसी,
यौवन की आग,
बिछोह की धूल,
और अधूरी प्रार्थनाओं के
मकड़ी-जाले लटके रहते हैं।
शिव…
कुछ तोड़ते नहीं।
वे बस एक खिड़की खोल देते हैं।
और सदियों से रुकी हुई
प्राण-वायु भीतर उतर आती है।
फिर मनुष्य बदलता नहीं—
वह ऋतु बदलता है।
पतझड़ से वसंत हो जाता है।
महाकाल की भस्म
राख नहीं,
समय का हस्ताक्षर है—
जो हर माथे पर लिखता है,
जो खिलता है,
उसे झरना भी होगा।
जो जन्मा है,
उसे लौटना भी होगा।
इसलिए
खिलना भी पूरे मन से,
और झरना भी पूर्ण समर्पण से।”
महाकाल जाने पर
प्रार्थनाएँ माँगी नहीं जातीं,
वे नदी की तरह
बहना सीख जाती हैं।
और मन…
दीपक नहीं रहता,
वह क्षितिज बन जाता है—
जहाँ हर डूबता हुआ सूर्य भी
एक नए प्रभात की गर्भ-ध्वनि बनकर
क्षितिज के भीतर
धीरे-धीरे धड़कता रहता है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







