कविता:जीवन के रक्षक
दिनांक:01/07/2026
सफेद कोट में लिपटा वो, एक देवदूत सा आता है,
जब टूटने लगती है सांसें, वो नया हौसला जगाता है।
रात हो या दिन का उजाला, वो चैन की नींद भुलाता है,
बीमारी के काले बादलों से, वो सूरज खींच लाता है।
दर्द से तड़पते मरीज को, जब धीरज का वो हाथ दे,
आधी बीमारी तभी मिटे, जब डॉक्टर का वो साथ मिले।
दवाइयों के कड़वे घूंट में, वो सेहत की मिठास भरता है,
मौत की दहलीज़ से भी, वो जिंदगी को वापस करता है।
अपनी खुशियां छोड़कर वो, अस्पताल का रुख करता है,
हर धड़कन को बचाने में, वो अपना सब कुछ अर्पण करता है।
भगवान का रूप है वो धरती पर, ये बात नहीं कोई झूठी है,
उनकी मेहनत और दुआओं से ही, हर मुर्झाती आस उठी है।
थकान चेहरे पर हो भले, पर मुस्कान कभी न खोती है,
उनकी दी हुई हर एक दवा, जैसे अमृत की एक मोती है।
सलाम है उन हाथों को, जो निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं,
इस धरती के सच्चे रक्षक, जो हमारे जीवन में रंग भरते हैं।
सत्यवीर वैष्णव बारां राजस्थान 💞✒️💞


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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