""हाथ में पत्थर को लिए खड़ा कि इससे ऊँची इमारत नहीं है,
पास में इमारत के पास रख देता हूं तब लोक लाज से बचने को इसके पास कोई शरारत नहीं है,
अकेला हवा से बातें करने लगा,
विचार का स्तर बदलने लगा,
पर प्रभाव धरातल पर मेरा तो कुछ नहीं है, लोक लाज में असर भी अधूरा है,
इनके इरादे तो कुछ नहीं है।
नहीं मैं एक ही पत्थर हो सकता हूं,
मिट्टी के जमावड़े ने धरातल की भावानात्मक ऊर्जा को मुझ तक पहुंचने नहीं दिया,
बात इसकी जीवंतता का नहीं है इसके कारण मैं बहुत हिला, टूटा, छोटा होता गया मिट्टी में मिल गया ना मैं कुछ रहा
ना अस्तित्व ने कुछ किया एक पत्थर को मजबूत से मजबूर होना,
छोटा हूँ अब इसी मिट्टी में दबा, बिगड़ गया हूं, अब निर्जीव तो नहीं लेकिन हलचल में नहीं हूं,
लोक लाज गहरी स्थाई वेदना है,
नीचे संपूर्ण परतों से अनजान हूं,
अंदर क्या हो रहा है,
बस अनुमान लगाने जितना लोक लाज है शायद ये खत्म हो सकता है,
आकर कोई भी पैर रख देगा क्या कर सकता हूं,
पत्थर तो चुभता है, गिराता है,
मिट्टी क्या करेगी, किसी निशान का निशाना बस,
बाहर दिखा देता है अंदर बहुत कुछ है, लालिमा के व्योम और पदचिह्न से अनजान।
मैं रंगीन तो नहीं हूं पर मुझमें रंग देखने के शौक लोक लाज ने रखें,
"पर वो रंग वो हाँ के नजरंदाज में छुपाकर मेरे अस्तित्व तक देखने पहुंच जाते हैं जो कपड़े वो पहनाकर खुश होते हैं।।""
- ललित दाधीच।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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