पराया मायका (लघुकथा)
"मेरी बेटी आएगी, उसे ये पसंद है,उसे वो पसंद है.... मां की इन्हीं यादों के साथ बरसों बाद रीमा अपने मायके जा रही थी। ट्रेन की खिड़की से बाहर भागते खेतों को देखते हुए
उसे याद आ रहा था— कैसे मां हर बार उसके आने से कई दिन पहले ही तैयारियां शुरू कर देती थीं।
स्टेशन पर उतरते ही रीमा की आंखें भीड़ में किसी परिचित चेहरे को खोजने लगीं। फिर अचानक उसे याद आया— अब मां नहीं हैं।
अब कोई हाथ हिलाते हुए दूर से नहीं पुकारेगा—
“रीमा… इधर आ!”

भाई लेने आया था। रास्ते भर उसने ऑफिस, ट्रैफिक और बच्चों की पढ़ाई की बातें कीं, लेकिन रीमा खामोश रही। उसकी नजरें उन रास्तों पर टिकी थीं जहां कभी मां उसके साथ बाज़ार जाया करती थीं।
घर सामने आया तो उसका दिल तेज़ धड़कने लगा। वही पुराना दरवाज़ा, वही आंगन, वही तुलसी का चौरा… मगर फिर भी सब कुछ बदल गया था।
पहले जैसे ही वह घर में कदम रखती, मां दौड़कर उसे गले लगा लेती थीं।
“इतनी दुबली क्यों हो गई? ठीक से खाती नहीं क्या?”
और फिर बिना रुके सवालों की झड़ी लग जाती।
आज दरवाज़ा भाभी ने खोला।
उन्होंने मुस्कुराकर स्वागत किया, पानी दिया, हालचाल पूछा। सब ठीक था, फिर भी कुछ अधूरा था।
रीमा धीरे-धीरे घर के हर कोने को देखने लगी।
दीवारों पर नया पेंट हो गया था। पुराने पर्दे बदल गए थे। मां का लकड़ी वाला मंदिर अब दूसरे कोने में रखा था।
लेकिन सबसे ज्यादा खालीपन रसोई में महसूस हुआ।
यहीं मां घंटों खड़ी होकर उसके पसंदीदा पकवान बनाया करती थीं।
रीमा को याद आया, शादी के बाद जब वह पहली बार मायके आई थी, तब मां सुबह चार बजे उठ गई थीं।
उसकी पसंद की कचौड़ियां, खीर और चटनी बनाई थी।
और जब रीमा ने हंसकर कहा था—
“मां, इतना कौन बनाता है?”
तो मां ने मुस्कुराकर जवाब दिया था—
“बेटियां रोज-रोज मायके थोड़ी आती हैं।”
उस याद ने रीमा की आंखें भिगो दीं।
शाम को वह मां के कमरे में गई।
कमरा अब स्टोर जैसा बन गया था। एक कोने में मां की तस्वीर रखी थी, जिस पर सूखी हुई माला टंगी थी।
रीमा तस्वीर के सामने बैठ गई।
उसने धीरे से तस्वीर को छुआ और बोली—
“मां, मैं आ गई…”
बस इतना कहते ही उसके आंसू बह निकले।
उसे लगा जैसे मां अभी उसके सिर पर हाथ फेर देंगी।
रात के खाने पर सब साथ बैठे।
भतीजे मोबाइल में व्यस्त थे, भाई टीवी देख रहा था, भाभी रसोई संभाल रही थीं।
घर में लोग तो पहले से ज्यादा थे, मगर अपनापन कहीं खो गया था।
उसे याद आया, मां खाने की थाली लेकर उसके पीछे-पीछे घूमती थीं।
“थोड़ा और खा ले।”
“ये मिठाई भी चख।”
“तेरा चेहरा उतरा क्यों है?”
मां सिर्फ खाना नहीं परोसती थीं, वे अपना स्नेह परोसती थीं।
तब उसे पहली बार समझ आया कि मायका सिर्फ ईंटों और दीवारों से नहीं बनता।
मायका मां की आवाज़ से बनता है…
उसकी प्रतीक्षा से बनता है…
उसकी ममता से बनता है।
सुबह जब रीमा वापस जाने लगी तो भाभी ने औपचारिकता में कहा—
“दीदी, अब जल्दी-जल्दी आया कीजिए।”
रीमा ने घर की ओर एक लंबी नजर डाली।
उसकी आंखें मां को खोज रही थीं।
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“हां… आऊंगी।”
लेकिन वह जानती थी, मां के जाने के बाद मायका भी कहीं पीछे छूट गया है।
अब वहां सिर्फ घर बचा है, मां वाला अपनापन नहीं।
सच ही तो है—
मां के रहते बेटी चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए, मायके में हमेशा बच्ची रहती है।
और मां के जाने के बाद…
वही मायका पराया सा लगने लगता है|
स्वरचित ✍️ मौलिक
नमिता सिन्हा, बेंगलुरु


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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