(बाल कविता)
लौकी फैली छप्पर पर
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हरी भरी कितनी सुंदर ।
लौकी फैली छप्पर पर ।।
बेलों पर बतिया आई
पल-पल लेती अंगड़ाई
खुद आकार बदलती है
धीरे-धीरे बढ़ती है
काला टीका लगवा दें
कहीं लगे न इसे नज़र ।
लौकी फैली छप्पर पर ।।
लौकी जब बढ़ जाती है
तब वह तोड़ी जाती है
हलुआ इसका भाता है
सबका मन ललचाता है
खाने वाले रहते हैं
गांव गली व शहर शहर ।
लौकी फैली छप्पर पर ।।
इसकी सब्जी बनती है
सबको अच्छी लगती है
मम्मी खीर बनातीं जब
मज़ा बहुत आ जाता तब
देख अगर लेते व्यंजन
होता मन को नहीं सबर।
लौकी फैली छप्पर पर ।।
बहुत आयरन मिलता है
खून इसी से बढ़ता है
चुस्ती फुर्ती आती है
तन को सबल बनाती है
बीमारी को दूर करे
पौष्टिकता का है सागर ।
लौकी फैली छप्पर पर ।।
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~राम नरेश 'उज्ज्वल'


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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