लहु की जगह अश्क़ बहने लगे हैं रग-रग में अब तों
उदासीनता घर कर गई मेरे सफ़ेद ज़िगर में अब तों
इश्क़ की लाश क़ो यादों के गिद्ध नोचकर खा रहे हैं
ज़ख़्मी रूह फंस के रह गई बेबस ज़िस्म में अब तों
रोते,बिलखते,सिसकते,तङपते कब तलक रहते हम
कलाई काटने बैठे हैं लेकर के खंज़र हाथ में अब तों
घर का पंखा रोज़ दर्द की दुहाई देते-देते बंद हुआ हैं
हाल यूँ हुआ हर रात सोते हैं रस्सी के साथ में अब तों
क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा ज़ुल्मी क़ो सज़ा मिल भी जाए
कृष्णा पूरी तरह उलझ गई हैं दर्दी तिलिस्म में अब तों..
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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