Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

मेरी रसोई के मसालों की पंचायत

आज पेट खराब होने के बाद
मैं रसोई में गई और मसालों से कहा—

“भाइयों, बहनों,
ज़रा बैठक करो।

तुम लोगों से आज
एक-एक करके हिसाब चाहिए।”

सबसे पहले मिर्च आगे आई।

मैंने कहा—
“तुम्हारा काम?”

मिर्च बोली—
“खाने में तीखापन लाना।”

मैंने कहा—
“और मेरे जीवन में?”

मिर्च बोली—
“वहाँ तो मैं जन्म से हूँ,
मुझे अलग से क्या श्रेय चाहिए?”

मैंने कहा—
“अभी चुप रहो।

पेट खराब है मेरा,
तुम्हारा नाम सुनते ही
अंदर से आंदोलन शुरू हो जाता है।”

मिर्च वापस डिब्बे में चली गई।

फिर हल्दी आई।

मैंने पूछा—
“तुम क्या करती हो?”

हल्दी बोली—

“दाल-सब्ज़ी को रंग देती हूँ,
हल्दी वाला दूध बनाती हूँ,
भारतीय रसोई में
मेरा भावनात्मक महत्व भी है।”

मैंने कहा—

“अच्छा?

तो फिर मेरे पेट को
तुमसे देखकर इतनी घबराहट क्यों होती है?”

हल्दी बोली—

“वह तुम्हारा निजी मामला है,
मेरा विभाग अलग है।”

अगला नंबर जीरे का था।

जीरा अकड़कर आया।

“मेरा काम है
तड़का लगाना।”

मैंने कहा—

“बस?”

जीरा बोला—

“बस नहीं।

मुझे भूनते ही
पूरी रसोई को पता चल जाता है
कि खाना बन रहा है।”

मैंने कहा—

“मतलब तुम मसाला कम,
घोषणापत्र ज़्यादा हो।”

जीरा बोला—

“बिल्कुल।”

धनिया आगे आया।

मैंने पूछा—

“तुम?”

बोला—

“मैं स्वाद में खुशबू देता हूँ,
चटनी बनाता हूँ,
ऊपर से सजाता हूँ।”

मैंने कहा—

“अच्छा,
तुम्हारा काम असल में
खाने का मेकअप करना है?”

धनिया बोला—

“आप इसे मेकअप कहिए,
हम इसे गार्निशिंग कहते हैं।”

फिर काली मिर्च आई।

मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

“तुम्हारा विभाग?”

वह बोली—

“सूप, चाय, काढ़ा,
सलाद, सब्ज़ी—
जहाँ थोड़ी गर्माहट चाहिए,
वहाँ मेरी एंट्री होती है।”

मैंने कहा—

“तुम्हारा स्वभाव भी
नाम जैसा ही है।”

काली मिर्च बोली—

“कम से कम
मैं बिना बुलाए
हर जगह नहीं जाती।”

मैंने मिर्च की तरफ देखा।

मिर्च ने मुँह फेर लिया।

फिर लौंग आई।

मैंने पूछा—

“तुम क्या करती हो?”

लौंग बोली—

“चाय में, पुलाव में,
मसाले में खुशबू देती हूँ।

और जब दाँत में दर्द हो
तो मेरी याद आती है।”

मैंने कहा—

“मतलब तुम्हें खाने से ज़्यादा
दाँतों की नौकरी पसंद है?”

लौंग बोली—

“जिस समय जिसकी ज़रूरत हो,
वही मेरा क्षेत्र है।”

फिर इलायची आई।

वह बहुत सज-धजकर आई थी।

मैंने कहा—

“तुम इतनी तैयार होकर क्यों आई हो?”

बोली—

“मैं चाय और मिठाइयों की
सौंदर्य विशेषज्ञ हूँ।”

मैंने पूछा—

“और सब्ज़ी?”

बोली—

“वहाँ मेरी इज़्ज़त नहीं।”

मैंने सिर हिलाया।

बात सही थी।

फिर दालचीनी आई।

मैंने पूछा—

“तुम?”

बोली—

“चाय, पुलाव, मिठाई,
गरम मसाला—
खुशबू मेरा विभाग है।”

मैंने कहा—

“तुम्हें देखकर लगता है
तुम खाने की नहीं,
परफ्यूम इंडस्ट्री की हो।”

दालचीनी खुश हो गई।

फिर तेजपत्ता आया।

मैंने पूछा—

“आपका योगदान?”

तेजपत्ता बोला—

“मैं पूरी सब्ज़ी में
चुपचाप पड़ा रहता हूँ,

खुशबू देता हूँ,

और खाते समय
सब मुझे निकालकर
किनारे रख देते हैं।”

मैंने कहा—

“ओह!

तुम तो रसोई के
वरिष्ठ कर्मचारी निकले।

काम पूरा,

क्रेडिट शून्य।”

तेजपत्ता बोला—

“अब समझीं?”

फिर अजवाइन आई।

मैंने उसे देखते ही कहा—

“तुम्हें तो मैं जानती हूँ।”

अजवाइन बोली—

“हाँ।

जब पेट ठीक हो
तो कोई पूछता नहीं,

जब पेट बिगड़ जाए
तो सबसे पहले
मेरी याद आती है।”

मैंने कहा—

“तुम रसोई की
आपातकालीन सेवा हो।”

अजवाइन बोली—

“और बिना छुट्टी के।”

फिर हींग आई।

मैंने पूछा—

“तुम्हारा काम?”

हींग बोली—

“दाल में खुशबू,
सब्ज़ी में स्वाद,
और गैस की शिकायत में
विशेष भूमिका।”

मैंने कहा—

“तुम तो डॉक्टर निकलीं!”

हींग बोली—

“नहीं बहन,
बस अनुभव बहुत है।”

फिर नमक आया।

मैंने कहा—

“तुम्हारे बारे में तो सब जानते हैं।”

नमक बोला—

“हाँ।

मेरे बिना खाना फीका,

मेरे ज़्यादा होने पर
पूरा खाना बर्बाद।”

मैंने कहा—

“मतलब संतुलन का ठेका तुम्हारे पास है?”

नमक बोला—

“यही तो मेरी असली नौकरी है।”

तभी गरम मसाला दूर से बोला—

“मेरे बारे में भी पूछिए!”

मैंने कहा—

“तुम्हारा काम?”

वह बोला—

“अंत में आकर
पूरे खाने को
ऐसा व्यक्तित्व देना
कि सबको लगे
आज खाना विशेष है।”

मैंने कहा—

“मतलब तुम
रसोई के अंतिम समय वाले
ओवरकॉन्फिडेंट कर्मचारी हो।”

गरम मसाला बोला—

“पर लोकप्रिय तो हूँ।”

मैंने पेट पकड़ते हुए कहा—

“आज तुम सबकी उपयोगिता समझ आई।

मगर फिलहाल
मेरे पेट की सरकार ने
तुम सब पर प्रतिबंध लगा रखा है।”

मिर्च बोली—

“कितने दिन?”

मैंने कहा—

“पता नहीं।”

अजवाइन मुस्कुराई—

“मेरी ड्यूटी कब से?”

मैंने कहा—

“तुम अभी से शुरू करो।”

और रसोई के सारे मसाले
एक-दूसरे को देखकर हँसने लगे।

क्योंकि उन्हें भी पता था—

अच्छे दिनों में हम स्वाद के लिए जीते हैं,
और पेट खराब हो तो
अजवाइन के भरोसे जीते हैं।




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (1)

+

सरिता पाठक said

अरे वाह श्रद्धा जी आपने तो हर मसाले की परिभाषा गढ़ दी उनकी उपयोगिता व उनके पद का बहुत hi सुंदरता से चित्रण किया है बहुत सुन्दर रचना 👌बहुत आनन्द आया आपकी रचना पढ़ कर, आपको सादर प्रणाम 🙏

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