"कुछ लिखने के बाद कुछ तुम लिखना"
"मुरझाते नहीं तो फूल भी मुस्कुराते,
चुभते नहीं तो काँटे भी दिल लगाते,
आखिरी पल में दीवानी ना होती तो मौत भी साथ निभाती,
फटे हाल ना करती तो गरीबी भी जीवन शैली दिखलाती,
उम्मीदों की डोरी ना होती तो हमारे माँ बाप को अपनी खुशियां नज़र आती,
इतने ना रोते बचपन में बच्चें तो माँ भी थोड़ा चैन पाती,
लाज, शर्म, प्रेम, परिवार का कम दिखावा होता तो स्त्रियां भी इंसान नज़र आती,
भावनाएं कम सागर में लहराती तो सुकून की कीमत नज़र आती,
सार्वजनिक सुविधाएं सही उपलब्ध होती लोगों की जीवन प्रत्याशा बढ़ जाती,
राजनीति जनता से ना होती तो देश की प्रगति दिशा नज़र आती,
रात में नींद की इतनी जरुरत ना होती अनेक मेहनत रंग लाती,
देश का पैसा सही जगह लगता तो जन जन की पीढ़ियां विकसित हो जाती,
आकाशवाणी फिर से जाती तो अपराधों में भय की झलक नजर आती,
मन की वाणी अगर एक किताब लिख देती तो दुनिया साफ साफ नजर आती,
आँसू थोड़े बचा रख लेती इंसानियत तो अनेक जानवरों की बलि ना चढ़ पाती,
इतना समय ना दूर जाता तो थोड़ी यादें हकीकत बन जाती,
एक जीवन जीने में ही पल पल की हरकतें कहानी बन जाती,
आगे कुछ लिखना नहीं है शेष सबकी चेतना ही ज़ुबानी बन जाती।।"
- ललित दाधीच।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







