था एक सत्य,
जिसने मेरे अंतर्मन की पीठिका पर
असंख्य अस्फुट स्पंदनों से कथा लिखी,
पर शब्दों तक पहुँचते-पहुँचते
वह मौन में विलीन हो गया।
वह सत्य
जो कहा गया,
पर जैसे वायुमंडल ने ही उसे पी लिया हो,
कानों तक पहुँचा ही नहीं।
आने को चला था कोई—
जैसे संध्या में
कोई क्षीण ध्वनि,
क्षितिज की गोद में
धीरे-से विलीन हो जाती है।
पर वह आया नहीं,
ठहरा भी नहीं,
बस स्मृति की वीणा पर
एक अधूरा राग बनकर बजता रहा।
मेरा चला जाना
किसी आकस्मिक क्षण की तरह नहीं,
बल्कि नियति की पूर्वरचित पंक्ति की भाँति था.
जिसे मैंने बिना वाणी,
केवल दृष्टि और धैर्य से पढ़ा।
जो अधरों तक आकर
कंपित होकर लौट गया,
वह वाक्य
किसी निषिद्ध वेद मंत्र की तरह था,
जिसे कहना
पावनता का अपमान होता।
"मैं लौट न सकूँगी"
यह वाक्य नहीं,
एक युगांत था,
जो मौन के माथे पर लिखा गया।
कभी-कभी,
सत्य वह नहीं होता
जो कहा जाए,
वह तो वो है जो अनकहा रह गया...
था एक सत्य,
जो मन की झील में निश्चल पड़ा रहा,
हलचल तो हुई,
पर शब्दों की लहरें तट तक आ न सकीं।
वह सत्य,
जिसे अधरों ने छूने की चाह की,
पर किसी अज्ञात भय ने
उसे मौन की जंजीर में बाँध लिया।
आने को था कोई,
पर पग-चिह्न कभी दृष्टि तक न पहुँचे;
बाँहें व्याकुल थीं,
पर आलिंगन का क्षण कहीं खो गया।
मेरा चला जाना,
अकस्मात् नहीं था,
वह भी एक सत्य था
जो बिना कहे
सारी व्यथा सौंप गया।
वह वाक्य,
जो काँपते अधरों तक आया,
पर उच्चरित न हो सका,
स्मृति में
अनकही व्यथा बनकर ठहर गया।
न लौट सकूँगी कभी,
यह भी कहा था,
पर उस मौन ने,
जो शब्दों से अधिक मुखर था,
उसे किसी ने सुना नहीं।
कभी-कभी,
सबसे सच वही होता है,
जो कहा नहीं गया,
जो आँखों की नमी में
अधरों की थरथराहट में
और स्मृति की परछाईं में
बोलता रहता है,
सदियों तक।
बल्कि वह,
जो हृदय के उष्ण जल में
बूंद-सा गलकर
काल की धाराओं में बह जाता है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







