एक बाग़ था भीतर मेरे,
जहाँ
हर पत्ती की सरसराहट
तेरे चरणों की मृदु ध्वनि लगती थी।
मन के किवाड़
जब भी हौले से खुलते,
लगता था—
तू यहीं कहीं
अमृत-सा मुस्कुरा रहा है।
भक्ति की बेलें
लिपटी थीं मेरे रोम-रोम से,
जैसे तेरी कृपा
सप्तरंगी मेघ-सी मुझे ढाँपे हुए हो।
धूप भी वहाँ
सूरज की नहीं थी—
वो तेरी दया की अनवरत आभा थी,
जो मेरे अंतर की काई पर
मोरपंखी हरियाली जगा देती थी।
और मैं—
अलग कहाँ था तुझसे,
बस एक निर्वाण साया था
तेरे ही प्रकाश का,
जो हर श्वास
तेरी लय में बहता था।
फिर—
न जाने किस अदृश्य कर्म की धूल उठी,
कि मन के वही किवाड़
पाषाण हो गए…
तेरी आहट की जगह
अब विरह-सन्नाटा बोलता है,
जैसे तू पास होकर भी
अंतरिक्ष-सा ओझल हो गया हो।
भक्ति की बेलें सूख गई हैं,
अब वो सहारा नहीं देतीं—
बस जलती राख सी याद दिलाती हैं
कि कभी
तू यहीं फूलता-महकता था।
तेरी कृपा की धूप भी
अब ओस की बूँद-सी धुंधली है,
और मन की काई
फिर से अगाध अंधेरी हो चली है।
अब यहाँ
सिर्फ़ एक निःश्वास है—
एक अधूरा साया,
जो हर कंपन में
तुझे ही ढूँढता है…
तू दूर नहीं प्रभु—
दूर तो बस
मेरा ही दर्पण हो गया है,
जिसके उस पार
वही बाग़ है, वही घनघोर सन्नाटा —
बस तू उस आईने में नहीं,
और मैं अपनी ही रौशनी का शोक हूँ।
-इक़बाल सिंह “राशा”
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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