मैं गति में भी निर्विकार खड़ा,
जैसे सागर भीतर शांत पड़ा।
धड़कन भी हूँ, निस्तब्धता भी,
अग्नि भी हूँ, राख हुआ भी।
मैं जन्मों का अनलिखा क्रम,
और मृत्यु के आगे का मौन भ्रम।
क्षण-क्षण बिखरता जाता हूँ,
फिर भी अनंत में ठहर जाता हूँ।
मैं दृश्य भी, अदृश्य भी हूँ,
बंधा हुआ फिर मुक्त भी हूँ।
मिट्टी में गूँजता आकाश हूँ,
और आकाश में खोई प्यास हूँ।
मैं प्रश्न भी, उत्तर भी हूँ,
यात्री भी और पथ पर भी हूँ।
जिसे खोजता रहा जग बाहर,
वह दीप जला है भीतर-अंतर।
मैं बीज भी, वटवृक्ष भी हूँ,
विरक्ति भी और अनुराग भी हूँ।
जो टूट गया वह मैं ही था,
जो बचा रहा वह भी मैं हूँ।
मैं शब्द नहीं, अनुभूति हूँ,
सांसों के पार की प्रतीति हूँ।
नाद भी हूँ, शून्य भी हूँ,
संपूर्ण भी और गौण भी हूँ।
मैं सीमाओं में कैद नहीं,
पर सीमाओं से दूर नहीं।
अनेक रूप धरता हर पल,
फिर भी स्वयं से चूर नहीं।
मैं दर्पण पर ठहरी धूल भी,
और धूल में छिपा प्रकाश भी।
मैं नदी के खोए तट जैसा,
अपने ही भीतर प्रवास भी।
मैं वह पत्ता जो शाख छोड़
हवा में खुद को पढ़ता है,
और वही वृक्ष जड़ों में बैठा
मौन ऋचाएँ गढ़ता है।
मैं वह दीप जो बुझकर भी
अंधकार में जलता रहा,
मैं वह शून्य
जिसमें ब्रह्मांड चुपचाप पलता रहा।
मैं वह जो कभी कहा न गया,
जिसे मौन ने केवल सहा।
मैं अस्तित्व का गुप्त रहस्य,
और रहस्य में छिपा साक्ष्य।
मैं होकर भी अनुपस्थित हूँ,
अनुपस्थित होकर उपस्थित हूँ।
मैं रेत नहीं, वह समय हूँ—
जो मुट्ठी में रहकर भी मुक्त हूँ।
मैं ब्रह्म नहीं कहता खुद को,
पर ब्रह्म मुझी में बहता है।
मैं “मैं” से जब खाली होता,
तब सारा जग मुझमें रहता है।
जब सब मुझमें विलीन हुआ,
न प्रकाश रहा, न अंधकार—
तब जाना,
मैं कभी केवल “मैं” था ही नहीं,
मैं वह शून्य था
जिससे जन्मा हर आकार।
— इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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