१. पुकार
मैंने पहली बार
जब भीतर झाँका,
वहाँ
कोई शब्द नहीं था—
सिर्फ़
एक प्रतीक्षा थी।
वह प्रतीक्षा
किसी संसार की नहीं,
किसी मनुष्य की नहीं,
वह
तुम्हारी थी, प्रभु।
तुम
जो कभी आए नहीं,
क्योंकि
तुम कभी गए ही नहीं थे।
२. खोज
मैंने तुम्हें
मंदिरों में ढूँढा,
ग्रंथों में ढूँढा,
आकाश की ऊँचाइयों में ढूँढा—
पर तुम
हमेशा
मेरी साँसों के पीछे छिपे रहे।
मैं बाहर भटकता रहा,
और तुम
भीतर
मेरा इंतज़ार करते रहे।
३. थकान
एक दिन
मैं थक गया—
प्रार्थनाएँ करते-करते,
तुम्हें पुकारते-पुकारते।
तब
मैं चुप हो गया।
और उसी चुप्पी में
पहली बार
तुम्हारी आहट सुनी।
४. आहट
वह कोई शब्द नहीं था,
कोई आवाज़ नहीं थी—
सिर्फ़
एक शांति थी,
जो धीरे-धीरे
मेरे भीतर उतर रही थी।
जैसे
तुम कह रहे हो—
“मैं यहीं हूँ।”
५. समर्पण
मैंने
अपने प्रश्न छोड़ दिए,
अपनी इच्छाएँ छोड़ दीं,
अपना “मैं” छोड़ दिया।
क्योंकि
तुम्हें पाने के लिए
कुछ पाना नहीं,
सब खोना पड़ता है।
६. शबद
अब
मैं सुनता हूँ—
एक धुन,
जो किसी वाद्य से नहीं निकलती।
वह
मेरी आत्मा से उठती है,
और
तुम तक पहुँचती है।
और फिर
तुमसे लौटकर
मुझे ही भर देती है।
७. विरह
अब
तुमसे दूर होना
असंभव है,
फिर भी
तुम्हारे लिए तड़पना
मेरी नियति है।
क्योंकि
यह विरह ही
मिलन का द्वार है।
८. प्रकाश
एक दिन
मेरे भीतर
एक प्रकाश जन्मा—
वह सूर्य नहीं था,
वह अग्नि नहीं था,
वह
तुम थे।
और उस प्रकाश में
मैंने
अपने सारे अँधेरे खो दिए।
९. विलय
अब
मैं स्वयं को
महसूस नहीं करता—
जैसे
मैं एक बूँद था,
और अब
समुद्र हो गया हूँ।
मेरा नाम
मुझसे छूट गया है,
और
तुम्हारा होना
मेरा होना बन गया है।
१०. अंतिम मिलन
अब
कोई यात्रा नहीं है,
कोई दूरी नहीं है।
मैं
वहीं पहुँच गया हूँ,
जहाँ से
मैं चला था।
प्रभु—
अब
मैं तुम्हें नहीं ढूँढता,
क्योंकि
अब
मैं
तुम्ही मे हूँ।
— इक़बाल सिंह राशा
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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