(बाल कविता)
हथगोले-सी धूप
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आसमान से बरस रही है
हथगोले-सी धूप ।
किरणें क्रोधित हो कर अपना
बदल रही हैं रूप।।
पंखे, कूलर, ए.सी. सब
गर्मी में होते फेल ,
आइस्क्रीम कुल्फी से भी ना
कसती कभी नकेल ,
साधु संत कुटिया में तड़पें
राज महल में भूप।
आसमान से बरस रही है
हथगोले सी धूप ।।
पिघल रहा डामर सड़कों का
जैसे पिघले मोम ,
झुलस रही है धरती पूरी
झुलस रहा है व्योम ,
धधक रहा ज्वाला-सा कण-कण
उबल रहा है कूप।
आसमान से बरस रही है
हथगोले सी धूप ।।
पशु-पक्षी गर्मी से व्याकुल
व्याकुल हैं तालाब ,
ढूंढ रहे हैं तरुवर छाया
छाया भी बेताब ,
गर्मी से सुन्दर चेहरे भी
लगने लगे कुरूप।
आसमान से बरस रही है
हथगोले सी धूप ।।
सबकी प्यास बुझाता केवल
ठंडा-ठंडा नीर ,
और सुहाता सबके दिल को
शीतल-मंद-समीर ,
लस्सी पीने से लगती थोड़ी
तबियत अनुरूप।
आसमान से बरस रही है
हथगोले सी धूप ।।
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~राम नरेश 'उज्ज्वल'


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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