ये ज़मीं इक ग़ज़ल है, मुहब्बत-ओ-इत्तेफ़ाक की..
रज़ा है कभी आसमां, कभी ज़र्रा-ओ-ख़ाक की..।
रूह को अब जाने, किस बात की आरज़ू है यहां..
इस ज़िंदगी को भूख है, कई ज़िस्म-ओ-खुराक़ की..।
ज़माना भूल गया, नेकी-ओ-फ़रिश्ताजन इंसानों को..
हर दफ़ा जिक्र-ए दास्तां है, अंज़ाम-ए-सफ़्फ़ाक की..।
अब कौन किसका आर्ज़ूबंद है, कुछ मालूम नहीं..
इन दिनों कहीं कोई बात भी न हुई, सीना-चाक की..।
चाहता हूं खुद को रखूं यक़ीं ए तस्कीन हर वक्त मगर..
क्या करूं इस ख़बर-ए-साया-ओ-तशवीश-नाक की..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







