ज़मीं पर चाँद आए भी तो सब नाशाद रहते हैं,
जो अपनी ही कमी हो, उसको आसमान कहते हैं।
कि परवाह शौहरत-ए-पा की भला कब आसमान को है,
कदम इक जो बढ़े, तो दूसरा भी हम बढ़ाते हैं।
शुरू होकर ये रास्ते दूरियों के बाद रुकते हैं,
मुसाफ़िर थक के आख़िर में कहीं डेरा लगाते हैं।
ख़ुदी को अपनी मंज़िल पर बुलंद करने की ख़ातिर,
न जाने दिल को हम अक्सर यहाँ कितने बहाने लगाते हैं।
वो अपने दिल को पाकीज़ा समझकर बैठ जाते हैं,
मगर औरों के दामन में सदा वो खोट दिखाते हैं।
अधूरे लोग जो अपनी जगह से हिल नहीं पाते,
वही नादान पूरी दुनिया को आइना दिखाते हैं।
अजब रंज़िश है, अजब रज़ा है इस ज़माने की,
सहज ख़ुद के लिए होने में ही ज़माने लगाते हैं।
तेरी ग़लती पे ऐ 'ललित' जो अपने थे पराए से हुए,
ज़रा सी बात पर वो अपनों से दूरियाँ बढ़ाते हैं।
कि सोचा भी न था 'ललित' तू खुद को आज़माएगा,
यहाँ हम अपने होने पर भी इक प्रयोग लगाते हैं।
गिला क्या 'दाग़' अपनों का, ज़माने का यही ढब है,
यहाँ जो तीर चलते हैं, वो अपने ही चलाते हैं।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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