दीप जलाओ, पर बस बाहर नहीं —
थोड़ा भीतर भी उजाला करो,
जहाँ अब तक अँधेरा है,
वहाँ भी थोड़ा प्रकाश भरो।
हर साल हम घर सजाते हैं,
रंगोली बनाते हैं, मिठाई बाँटते हैं,
पर क्या कभी मन की धूल झाड़ी है?
क्या अपने भीतर की रात को हटाया है?
लक्ष्मी के स्वागत को दरवाज़े खुले रखते हो,
पर क्या किसी भूखे के लिए भी थाली रखी है?
क्या किसी अकेले के आँगन में
दीप की लौ जली है?
दीप जलाओ —
उनके लिए भी जिनके घर में बिजली नहीं,
उनके दिल में उम्मीद नहीं।
दीप जलाओ —
उनके लिए जो खो चुके हैं मुस्कान का अर्थ,
जो अभी भी अंधेरों से लड़ रहे हैं।
क्योंकि सच्ची दीपवाली तब होगी,
जब उजाला हर कोने तक पहुँचेगा,
जब दीपक जलाने वाला
स्वयं भी दीप बन जाएगा।
दीप जलाओ,
पर सिर्फ़ तेल और बाती से नहीं —
दया, प्रेम और करुणा से भी।
दीप जलाओ उस आशा के लिए,
जो अब भी बची है किसी बूढ़ी माँ की आँखों में,
उस विश्वास के लिए,
जो अब भी किसी बच्चे के सपनों में पलता है।
दीप जलाओ —
मन के भीतर भी,
जहाँ संदेह, ईर्ष्या, और भय बसे हैं।
उन्हें भी रोशनी दो —
क्योंकि अंधेरा बाहर नहीं,
सबसे पहले हमारे भीतर होता है।
चलो इस बार दीपावाली कुछ अलग मनाएँ —
किसी से माफ़ी माँगें,
किसी का हाथ थामें,
किसी का दर्द बाँटें,
किसी के जीवन में उजाला पहुँचाएँ।
तब कहना —
हाँ, इस बार सच्ची दीपावाली आई है।
क्योंकि जब मन का दीपक जलता है,
तभी सृष्टि जगमगाती है।
दीप जलाओ —
बस बाहर नहीं,
मन के भीतर भी।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







