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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

इक़बाल सिंह राशा की कविता “पुकार के पार ”

अब
मैं तुम्हें पुकारता नहीं,
क्योंकि पुकार
हमेशा दूरी से जन्म लेती है,
और अब मैं
तुमसे दूरी में रहना नहीं चाहता।

मैंने उम्र भर
तुम्हें शब्दों में ढूँढा,
पर शब्द—
हर बार
मेरे होंठों से गिरकर
मिट्टी हो गए।

तब
मैंने अपनी ही ख़ामोशी में उतरना सीखा।

वहाँ
कोई ध्वनि नहीं थी,
कोई प्रार्थना नहीं थी—
सिर्फ़
एक अनसुनी धुन थी।

और उसी क्षण जाना—
वह धुन मेरी नहीं थी,
वह तुम थे।

प्रभु,
मैंने तुम्हें आँखों से नहीं देखा,
पर तुम
मेरी हर दृष्टि के पीछे उपस्थित रहे।

मैंने तुम्हें कानों से नहीं सुना,
पर तुम
मेरी हर धड़कन में गूँजते रहे।

मैंने तुम्हें छुआ नहीं,
पर तुम
मेरी हर पीड़ा में
मुझे स्पर्श करते रहे।

अब
जब यह शरीर
धीरे-धीरे
मुझसे अपना अधिकार वापस ले रहा है,
मैं भयभीत नहीं हूँ—

क्योंकि मैं समझ चुका हूँ,
मैं समाप्त नहीं हो रहा,
मैं लौट रहा हूँ।

जैसे
कोई परदेसी
अनंत भटकन के बाद
अपने ही घर का द्वार पहचान लेता है।

उस अंतिम क्षण
मैं तुम्हारे सामने खड़ा नहीं होऊँगा—
क्योंकि वहाँ
खड़ा होने के लिए
कोई “मैं” शेष नहीं रहेगा।

सिर्फ़
एक चेतना होगी—
और वह
तुम्हारी होगी।

मेरी आत्मा
तुम्हारे शबद में विलीन हो जाएगी,
जैसे
एक बूँद
समुद्र में गिरकर
अपना नाम खो देती है—
और समुद्र हो जाती है।

उस क्षण
कोई मिलन नहीं होगा,
कोई उत्सव नहीं होगा—

सिर्फ़
एक शाश्वत सत्य प्रकट होगा—

कि मैं
कभी तुमसे अलग था ही नहीं।

यह जीवन
सिर्फ़ एक स्वप्न था,
और अब
मैं जाग रहा हूँ।

मैं
अपने अंतिम स्वर को विसर्जित कर
तुम्हारी अनंत धुन में
समा रहा हूँ।

अब
मैं नहीं हूँ—

सिर्फ़ तुम हो।


— इक़बाल सिंह राशा
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (5)

+

रीना कुमारी प्रजापत said

Bahut khubsurat rachna... Bahut dino baad dikhai diye sir ji sab khairyat to hai na....

वन्दना सूद said

sir आपकी हर पंक्ति दिल को छूती है क्या लिखते हैं आप 🙏🙏👏👏👌👌आपके लेखन को बहुत miss किया मैंने । आपका number भी ढूँढने की कोशिश की पर नहीं मिला । सब ठीक है sir आप इतने समय से नहीं आए इसलिए पूछ लिया

वन्दना सूद said

जैसे
कोई परदेसी
अनंत भटकन के बाद
अपने ही घर का द्वार पहचान लेता है।

ये lines तो कमाल लिखी है

मनोज कुमार सोनवानी "समदिल" said

आदरणीय इकबाल जी सादर प्रणाम 🙏🙏 सबसे पहले तो आप महफ़िल में वापस आए इस बात की बहुत बड़ी या मिली। आपकी चिंता लगी रहती थी। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप हमेशा स्वस्थ रहें, मस्त रहें। ऐसे ही महफ़िल में बने रहें और अपना प्यार बांटते रहे। काफी दिनों बाद आपकी रचना पढ़कर ऐसा लगा जैसे भटकते प्यासे को अचानक बहता दरिया मिल गया हो। इतनी सुन्दर रचना 👌👌👌🙏 अलौकिक शक्ति करीब हो जाने, उसमें समा जाने की ,मौन तड़प। स्वयं को शून्य मानने और परमशक्ति को ही सर्वस्व समर्पित करने का सुंदर मनोभाव 👌 शब्दों का होंठों से गिरकर मिट्टी हो जाना। वाह! एक कल्पनातीत रचना 👌👌🙏🙏🌹🌹 वाहेगुरु सदा आपकी खैर करे!!🙏🌹🙏

इक़बाल सिंह “राशा“ said

रीना जी, वन्दना जी, समदिल जी, इस स्नेह और अपनत्व के लिए आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद, और अनुपस्थिति के लिए माफ़ी, मैं भी सदा आप सब की बहुत कमी महसूस कर रहा हूँ परमात्मा ने चाहा तो पुनः मंच पर नियमित हो सकूंगा एक बार फिर आप सब का बहुत बहुत आभार और धन्यवाद

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