अब
मैं तुम्हें पुकारता नहीं,
क्योंकि पुकार
हमेशा दूरी से जन्म लेती है,
और अब मैं
तुमसे दूरी में रहना नहीं चाहता।
मैंने उम्र भर
तुम्हें शब्दों में ढूँढा,
पर शब्द—
हर बार
मेरे होंठों से गिरकर
मिट्टी हो गए।
तब
मैंने अपनी ही ख़ामोशी में उतरना सीखा।
वहाँ
कोई ध्वनि नहीं थी,
कोई प्रार्थना नहीं थी—
सिर्फ़
एक अनसुनी धुन थी।
और उसी क्षण जाना—
वह धुन मेरी नहीं थी,
वह तुम थे।
प्रभु,
मैंने तुम्हें आँखों से नहीं देखा,
पर तुम
मेरी हर दृष्टि के पीछे उपस्थित रहे।
मैंने तुम्हें कानों से नहीं सुना,
पर तुम
मेरी हर धड़कन में गूँजते रहे।
मैंने तुम्हें छुआ नहीं,
पर तुम
मेरी हर पीड़ा में
मुझे स्पर्श करते रहे।
अब
जब यह शरीर
धीरे-धीरे
मुझसे अपना अधिकार वापस ले रहा है,
मैं भयभीत नहीं हूँ—
क्योंकि मैं समझ चुका हूँ,
मैं समाप्त नहीं हो रहा,
मैं लौट रहा हूँ।
जैसे
कोई परदेसी
अनंत भटकन के बाद
अपने ही घर का द्वार पहचान लेता है।
उस अंतिम क्षण
मैं तुम्हारे सामने खड़ा नहीं होऊँगा—
क्योंकि वहाँ
खड़ा होने के लिए
कोई “मैं” शेष नहीं रहेगा।
सिर्फ़
एक चेतना होगी—
और वह
तुम्हारी होगी।
मेरी आत्मा
तुम्हारे शबद में विलीन हो जाएगी,
जैसे
एक बूँद
समुद्र में गिरकर
अपना नाम खो देती है—
और समुद्र हो जाती है।
उस क्षण
कोई मिलन नहीं होगा,
कोई उत्सव नहीं होगा—
सिर्फ़
एक शाश्वत सत्य प्रकट होगा—
कि मैं
कभी तुमसे अलग था ही नहीं।
यह जीवन
सिर्फ़ एक स्वप्न था,
और अब
मैं जाग रहा हूँ।
मैं
अपने अंतिम स्वर को विसर्जित कर
तुम्हारी अनंत धुन में
समा रहा हूँ।
अब
मैं नहीं हूँ—
सिर्फ़ तुम हो।
— इक़बाल सिंह राशा
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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