Newहैशटैग ज़िन्दगी पुस्तक के बारे में updates यहाँ से जानें।


Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat


Show your love with any amount — Keep Likhantu.com free, ad-free, and community-driven.

Show your love with any amount — Keep Likhantu.com free, ad-free, and community-driven.



The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

Newहैशटैग ज़िन्दगी पुस्तक के बारे में updates यहाँ से जानें।

Newसभी पाठकों एवं रचनाकारों से विनम्र निवेदन है कि बागी बानी यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करते हुए
उनके बेबाक एवं शानदार गानों को अवश्य सुनें - आपको पसंद आएं तो लाइक,शेयर एवं कमेंट करें Channel Link यहाँ है

The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

इक़बाल सिंह राशा की कविता “पुकार के पार ”

अब
मैं तुम्हें पुकारता नहीं,
क्योंकि पुकार
हमेशा दूरी से जन्म लेती है,
और अब मैं
तुमसे दूरी में रहना नहीं चाहता।

मैंने उम्र भर
तुम्हें शब्दों में ढूँढा,
पर शब्द—
हर बार
मेरे होंठों से गिरकर
मिट्टी हो गए।

तब
मैंने अपनी ही ख़ामोशी में उतरना सीखा।

वहाँ
कोई ध्वनि नहीं थी,
कोई प्रार्थना नहीं थी—
सिर्फ़
एक अनसुनी धुन थी।

और उसी क्षण जाना—
वह धुन मेरी नहीं थी,
वह तुम थे।

प्रभु,
मैंने तुम्हें आँखों से नहीं देखा,
पर तुम
मेरी हर दृष्टि के पीछे उपस्थित रहे।

मैंने तुम्हें कानों से नहीं सुना,
पर तुम
मेरी हर धड़कन में गूँजते रहे।

मैंने तुम्हें छुआ नहीं,
पर तुम
मेरी हर पीड़ा में
मुझे स्पर्श करते रहे।

अब
जब यह शरीर
धीरे-धीरे
मुझसे अपना अधिकार वापस ले रहा है,
मैं भयभीत नहीं हूँ—

क्योंकि मैं समझ चुका हूँ,
मैं समाप्त नहीं हो रहा,
मैं लौट रहा हूँ।

जैसे
कोई परदेसी
अनंत भटकन के बाद
अपने ही घर का द्वार पहचान लेता है।

उस अंतिम क्षण
मैं तुम्हारे सामने खड़ा नहीं होऊँगा—
क्योंकि वहाँ
खड़ा होने के लिए
कोई “मैं” शेष नहीं रहेगा।

सिर्फ़
एक चेतना होगी—
और वह
तुम्हारी होगी।

मेरी आत्मा
तुम्हारे शबद में विलीन हो जाएगी,
जैसे
एक बूँद
समुद्र में गिरकर
अपना नाम खो देती है—
और समुद्र हो जाती है।

उस क्षण
कोई मिलन नहीं होगा,
कोई उत्सव नहीं होगा—

सिर्फ़
एक शाश्वत सत्य प्रकट होगा—

कि मैं
कभी तुमसे अलग था ही नहीं।

यह जीवन
सिर्फ़ एक स्वप्न था,
और अब
मैं जाग रहा हूँ।

मैं
अपने अंतिम स्वर को विसर्जित कर
तुम्हारी अनंत धुन में
समा रहा हूँ।

अब
मैं नहीं हूँ—

सिर्फ़ तुम हो।


— इक़बाल सिंह राशा
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड




समीक्षा छोड़ने के लिए कृपया पहले रजिस्टर या लॉगिन करें

रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (1)

+

रीना कुमारी प्रजापत said

Bahut khubsurat rachna... Bahut dino baad dikhai diye sir ji sab khairyat to hai na....

कविताएं - शायरी - ग़ज़ल श्रेणी में अन्य रचनाऐं




लिखन्तु डॉट कॉम देगा आपको और आपकी रचनाओं को एक नया मुकाम - आप कविता, ग़ज़ल, शायरी, श्लोक, संस्कृत गीत, वास्तविक कहानियां, काल्पनिक कहानियां, कॉमिक्स, हाइकू कविता इत्यादि को हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, उर्दू, इंग्लिश, सिंधी या अन्य किसी भाषा में भी likhantuofficial@gmail.com पर भेज सकते हैं।


लिखते रहिये, पढ़ते रहिये - लिखन्तु डॉट कॉम


लिखन्तु - ऑफिसियल

यह जीवन क्या है? - Vijay Laxmi

Jun 12, 2024 | कविताएं - शायरी - ग़ज़ल | लिखन्तु - ऑफिसियल  | 👁 838,820
LIKHANTU DOT COM © 2017 - 2026 लिखन्तु डॉट कॉम
Designed, Developed, Maintained & Powered By HTTPS://LETSWRITE.IN
Verified by:
Verified by Scam Adviser
   
Support Our Investors ABOUT US Feedback & Business रचना भेजें रजिस्टर लॉगिन