राहें तो अनेक हैं
पर मंज़िल तो एक ही है मेरी
राहों में चलते - फिरते भटक जाती हूँ
हर बार गम के आँसू आकर मेरे पास खड़े रहते हैं
हवा की तरह मेरे गम बदल जाते हैं
कभी पतंग की तरह मेरी खुशी उड़ जाती है
मुख्तसर सी जिंदगी में इतनी रौनक आई
कि आँखें चमकने लगी हैं मोती की भांति
बिना सपने देखे दर्द मंज़िल बन गया है
अब दर्द की दुनिया में मंजिल के फूल महक रहे हैं ।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







