"बेटियां पराया धन होती है"
किसने बनाया ये नियम?
एक पिता ने बहुत,
धीमे से कहा था
अगर समाज की रस्में
ना होतीं, तो उम्र भर का सहारा
मेरी बेटी ही होती।
जिसे कंधे पर बैठाकर
मेले दिखाए,
आज उसी को किसी और के
घर तक छोड़ आना पड़ता है।
जिसकी छोटी-सी उंगली पकड़कर,
उसने दुनिया से लड़ना सीखा।
आज उसी उंगली को,
धीरे से किसी और हाथ में
देना पड़ता है।
जिसे गोद में खिलाया,
लोरियाँ सुनाकर सुलाया,
जिसकी तोतली बातों पर
दिन भर की थकान मिटाई।
आज उसी को विदा करने के लिए,
हाथों में मेहंदी लगवानी पड़ती है।
वो कंधे जिस पर बैठाकर,
पूरे गाँव का मेला दिखाया था।
आज वही कंधे झुके हुए हैं,
बेटी की डोली उठाने को।
जिसे साइकिल पर आगे बिठाकर
स्कूल छोड़ने जाता था,
आज उसी को गाड़ी में बिठाकर
पराए घर भेजना पड़ता है।
और जब डोली उठती है ना,
तो पिता का कलेजा भी उठ जाता है साथ में।
बस शरीर रह जाता है खड़ा,
प्राण तो बेटी के साथ ही चले जाते हैं।
मंडप में बैठा पिता जब कन्यादान करता है,
तो अपना कलेजा काटकर दान करता है।
पंडित जी मंत्र पढ़ते हैं,
और पिता की आँखें बेटी का मुखड़ा पढ़ती हैं।
आखिरी बार जी भर के।
सब कहते हैं "बधाई हो!"
पर किसी ने ये नहीं देखा,
कि उस दिन एक पिता
भीतर से थोड़ा टूट जाता है।
वो रोता नहीं,
क्योंकि उसे
मजबूत दिखना होता है।
वो रोकता नहीं,
क्योंकि उसे
बेटी की खुशियाँ बड़ी लगती हैं।
सब बधाई देते हैं, मिठाई बाँटते हैं,
पर किसी ने नहीं देखा।
कि शेरवानी के पीछे,
एक पिता कितना टूटता है।
वो हँसता है सबके सामने,
क्योंकि बेटी की विदाई पर
आँसू अच्छे नहीं लगते।
रात को जब सब सो जाते हैं,
तो पिता छत पर अकेला रोता है।
तारों से पूछता है -
"मेरी बिटिया ठीक तो होगी ना?"
हवा से कहता है -
"जाकर मेरी लाडो को छू आना"
पर सच ये है,
उसकी हर दुआ में
बेटी का नाम उम्र भर रहता है।
विदाई सिर्फ बेटी की नहीं होती,
उस दिन एक पिता की आदतें भी
विदा हो जाती हैं।
सुबह की आवाज,
रात की बातें,
"पापा सुनिए ना."
अब सुबह चाय फीकी लगती है,
क्योंकि उसमें बेटी की हँसी की चीनी नहीं होती।
अब रोटी का निवाला गले से नहीं उतरता,
क्योंकि "पापा आप भी खाओ ना" कहने वाली नहीं होती।
उस दिन एक पिता की दुनिया उजड़ती है।
उसकी जरूरतें विदा होती हैं,
उसकी जिंदगी का मकसद विदा होता है।
बस रह जाता है तो एक खाली कमरा,
और दीवार पर टँगी उसकी तस्वीर।
उस कमरे में जाने से डरता है पिता,
क्योंकि हर कोने से बेटी की आवाज आती है।
उसके खिलौने, उसकी किताबें, उसका आईना।
सब पिता से पूछते हैं - "वो कब आएगी?"
और पिता के पास कोई जवाब नहीं होता।
फिर भी हर शाम छत पर खड़े होकर,
उस रास्ते को देखता है।
जिस रास्ते से डोली गई थी।
हर फोन की घंटी पर,
दिल जोर से धड़कता है-
"कहीं मेरी बिटिया का तो नहीं?"
और जब बेटी ससुराल से पहली बार आती है ना,
तो पिता दरवाजे पर ही खड़ा मिलता है।
उम्र भर का इंतजार आँखों में लेकर।
बेटी गले लगती है तो पिता पहली बार
जी भर के रो लेता है।
क्योंकि अब कोई नहीं कहता - "मर्द रोते नहीं"
तो फिर कौन कहता है कि,
बेटियाँ पराया धन होती हैं?
अगर पराया धन होतीं,
तो पिता का दिल क्यों तड़पता?
अगर पराई होतीं,
तो यादों में उम्र भर क्यों बसतीं?
बेटी पराई नहीं होती,
बेटी तो प्राण होती है।
बस समाज ने रस्मों के नाम पर,
पिता से उसकी प्राण-प्यारी छीन ली है।
काश ये रिवाज बदल जाए,
काश कोई पिता फिर न टूटे।
काश बेटी को विदा करते वक्त
ये न कहना पड़े कि,
"आज से ये पराई हुई।"
क्योंकि बेटी पराई नहीं होती,
बेटी तो आखिरी साँस तक।
बाबुल की लाडो होती है।
और पिता आखिरी साँस तक
सिर्फ उसका बाबुल होता है।
रचनाकार-पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







