चंचल हूँ मैं,
हाँ, हँस लेती हूँ खुलकर,
बात कर लेती हूँ सबसे,
मेरी आँखों में मौसम जल्दी बदल जाते हैं,
मेरे शब्दों में नदी-सी चहल-पहल रहती है…
पर इसका अर्थ यह कब से हो गया
कि मेरा चरित्र भी
तुम्हारी सोच की तरह हल्का है?
तुमने मेरी मुस्कान देखी,
मेरे संस्कार नहीं।
तुमने मेरी खिलखिलाहट सुनी,
मेरे संघर्षों की चीख नहीं।
तुमने मेरे खुले पंख देखे,
पर उन आँधियों को नहीं देखा
जिनसे लड़कर मैं उड़ना सीखी हूँ।
मैं चंचल हूँ…
क्योंकि जीवन ने बहुत रुलाया है मुझे।
मैं हँसती हूँ,
क्योंकि हर समय रोते रहना
मेरे स्वभाव में नहीं।
मैं लोगों से प्रेम से मिलती हूँ,
क्योंकि कटुता को विरासत बनाना
मुझे स्वीकार नहीं।
पर अफ़सोस…
इस दुनिया ने स्त्री की हँसी को
उसकी कमजोरी समझा,
उसकी सहजता को उपलब्धता,
उसकी मित्रता को निमंत्रण,
और उसके आत्मविश्वास को चरित्रहीनता का प्रमाण।
नहीं…
मैं किसी की सोच की कैदी नहीं हूँ।
मेरे पाँव में पायल है,
बाज़ार की कीमत नहीं।
मेरी आँखों में सपने हैं,
सौदे नहीं।
मेरे हृदय में करुणा है,
भूख नहीं।
तुमने मेरी मुस्कान देखी और कहानी लिख दी; मैंने तुम्हारी सोच देखी और किताब बंद कर दी।
याद रखना—
चरित्र कपड़ों की लंबाई में नहीं होता,
न आवाज़ की ऊँचाई में,
न हँसी की गूँज में।
चरित्र वहाँ होता है
जहाँ कोई देख न रहा हो
और फिर भी इंसान
अपनी मर्यादा से समझौता न करे।
मैं चंचल हूँ,
क्योंकि मैं जीवित हूँ।
मैं मुस्कुराती हूँ,
क्योंकि मेरे भीतर अभी भी उम्मीद बची है।
मैं खुलकर जीती हूँ,
क्योंकि मैंने अपने हिस्से की कैदें बहुत काटी हैं।
और जो लोग
मेरी उड़ान देखकर
मेरे चरित्र का फैसला लिखते हैं,
उन्हें बस इतना कहना है—
“मैं चंचल हूँ जनाब,
चरित्रहीन नहीं।
मेरी हँसी का अर्थ मत लिखो,
मेरी आत्मा का स्तर अभी
तुम्हारी सोच की पहुँच से बहुत ऊँचा है।”
“मैं नदी हूँ—शोर भी करूँगी, बहूँगी भी, हँसूँगी भी।
पर गंदा पानी अपने भीतर नहीं रखूँगी।
चंचलता मेरा स्वभाव है,
और मर्यादा मेरी पहचान।”
हाँ, चंचल हूँ मैं…
क्योंकि मैं ज़िंदा हूँ।
चरित्रहीन नहीं, क्योंकि मेरी आत्मा अब भी जागती है।
मेरे खिलखिलाने से अगर तुम्हें मेरा चरित्र दिखाई देता है, तो दोष मेरी हँसी का नहीं, तुम्हारी दृष्टि का है।
और याद रखना—
मैं हवा की तरह स्वतंत्र हूँ, पर धूल नहीं कि हर जूते से चिपक जाऊँ।
जिस स्त्री ने अपने आँसू तक सस्ते में नहीं बेचे, वह अपना चरित्र किसी की नज़र के बदले क्यों गिरवी रखेगी?
जिस दिन स्त्री को समझने के लिए तुम्हें उसकी हँसी नहीं, उसकी पीड़ा पढ़नी आ जाएगी,
उस दिन तुम्हारे सारे फ़ैसले शर्म से सिर झुका देंगे।
मैं चंचल हूँ, चरित्रहीन नहीं
मेरे बारे में फैसला सुनाने से पहले
अपनी नीयत को कटघरे में खड़ा करके देखो—
हो सकता है अपराधी मैं नहीं, तुम निकलो।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







