पीर कहे मत नाम धर, नाम भया व्यापार।
जो घट भीतर जागती, सोई सत् की धार॥
घट-घट पीड़ा एक-सी, मुख पर भिन्ना भेस।
हँसता जग बाजार में, भीतर रोवै देस॥
आँसू माँगे कारणा, मन दे उत्तर मौन।
जहँ अनुभव की आग है, तहाँ न बोले कौन॥
घाव न देखा देह पर, मन भया छलनी आज।
लोहे से न कट सकै, माया की यह लाज॥
माया बोली—सुख मिलै, मन ने मानी बात।
सुख आया दो पहर का, दुख बैठा दिन-रात॥
दर्पन देखा देह को, मन को देखे कौन।
जिसने भीतर झाँकिया, वही हुआ निर्भ्रांत॥
बाहर पूजा दीप की, भीतर धुआँ अपार।
मन-मंदिर उजड़ा पड़ा, कैसी आरती-धार॥
जग का वैद न जानता, इस पीड़ा का भेद।
औषध खोजे देह में, रोग बसै निज छेद॥
पीर अनामी संग चले, ज्यों छाया तन-साथ।
भागे जितना दूर तू, उतनी घेरे राह॥
दुख से भागा जीव सब, दुख ही गुरु बनि आय।
जिसने उसका मान किया, तिसने घर लखि पाय॥
मन ही कसाई हो गया, मन ही दे उपचार।
मन ही भीतर बाँधता, मन ही दे उद्धार॥
झूठे सुख के लोभ में, जग करता विस्तार।
बे-नामी इस पीर में, छिपा अमृत-संसार॥
कहै अखिल-भाव यह, सुन रे साधो ध्यान।
जिस दिन मैं गल जायगा, पीर बने पहचान॥
नाम न दे इस दर्द को, रहने दे अजान।
जिस घट पीड़ा जागती, तिस घट जागे ज्ञान॥


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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