सोचती हूँ एक अपना घर बनाऊँ
सोचती हूँ एक अपना घर बनाऊँ,
जो घर सिर्फ मेरा नहीं होगा,
उन सभी स्त्रियों का होगा,
जो रिश्तों के बीच रहकर भी
अकेली रह जाती हैं,
जो ससुराल में प्रताड़ित होती हैं,
समाज द्वारा ठुकराई जाती हैं,
और कभी-कभी अपनों के बीच भी
स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर पातीं।
उन सभी मुरझाए पुष्पों को
अपने आँगन में महकाऊँ,
जिन्हें दुनिया ने खिलने का
अवसर ही नहीं दिया।
जहाँ कोई बेटी
अपने आँसू छिपाकर न मुस्कुराए,
जहाँ किसी बहन को
अपने अधिकार के लिए न लड़ना पड़े,
जहाँ किसी माँ को
अपने बच्चों की खातिर
अपना दर्द न सहना पड़े।
जहाँ दरवाज़े पर दस्तक दे कोई,
तो उससे पहले यह न पूछा जाए—
“तुम्हारी गलती क्या थी?”
बल्कि इतना कहा जाए—
“आओ… अब तुम सुरक्षित हो।”
मैं ऐसा घर बनाना चाहती हूँ,
जहाँ सहारा किसी पर एहसान न हो,
सम्मान किसी की मेहरबानी न हो,
और स्वतंत्रता किसी की इजाज़त की मोहताज न हो।
जहाँ बेटियों को केवल विदा न किया जाए,
बल्कि उन्हें इतना मजबूत बनाया जाए
कि वे हर परिस्थिति में
अपने लिए खड़ी हो सकें।
और फिर सोचती हूँ—
क्यों न ऐसा घर
हम सब अपने-अपने मन में बनाएँ?
जहाँ नारी को देवी कहने से पहले
इंसान समझा जाए,
उसकी आवाज़ सुनी जाए,
उसके सपनों को सम्मान दिया जाए।
क्योंकि मेरा सपना सिर्फ
एक घर बनाने का नहीं है,
मेरा सपना है—
हर स्त्री के लिए एक ऐसा संसार बनाने का,
जहाँ वह डरकर नहीं,
अपने होने पर गर्व करके जी सके।
सोचती हूँ…
एक अपना घर बनाऊँ,
और चाहती हूँ—
यह चाहत सिर्फ मेरी न रहे,
हर दिल की चाहत बन जाए।
— सरिता पाठक
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







