शीर्षक : बाबूजी, मैं भी थक जाता हूँ
(एक बेटे, पति और पिता के मन की आवाज़)
बाबूजी, याद है आपको वो पहला दिन?
जब साइकिल से गिरा था मैं,
आपने उठाकर कहा था — "शेर का बच्चा रोता नहीं।"
बस उसी दिन से, मैंने रोना छोड़ दिया।
पर बाबूजी, सच कहूँ आज —
अब जब ज़िंदगी गिराती है, तो बहुत दर्द होता है।
मैं भी पिता बन गया हूँ अब, बाबूजी।
मेरा बेटा जब गिरता है, तो मैं उसे उठाता हूँ,
पर जब मैं अंदर से गिरता हूँ,
तो मुझे उठाने कोई नहीं आता।
क्योंकि मैं "बड़ा बेटा" हूँ, "पति" हूँ, "पिता" हूँ —
इन तीन नामों ने मेरी चीख को खामोशी पहना दी।
ऑफिस में जब बॉस की डाँट पड़ती है,
जवाब देने को जी करता है,
पर बच्चों की स्कूल-फीस आँखों में तैर जाती है।
मैं होंठों पर मुस्कान रख लेता हूँ,
और अन्दर ही अंदर बिखरता रहता हूं।
बीवी पूछती है — "आज चुप क्यों हो?"
मैं कहता हूँ — "बस थक गया हूँ।"
वो समझती है शरीर थका है,
पर बाबूजी, मेरी तो रूह थक गई है।
एक तारीख को तनख्वाह आती है,
पाँच तारीख तक सबमें बँट जाती है —
EMI, किराना, दूधवाला, बिजली, माँ की दवाई।
आखिर में बचता हूँ मैं, और मेरी ज़रूरतें — शून्य।
खुद की शर्ट कब ली थी, याद नहीं,
पर बेटे के पाँव में ब्रांडेड जूते हैं।
बीवी के लिए साड़ी, माँ के लिए शॉल,
और खुद के लिए? — "अगले महीने देखेंगे।"
रात दो बजे नींद जब रूठ जाती है,
तो आपका नंबर डायल करता हूँ,
और काट देता हूँ।
सोचता हूँ क्या कहूँगा?
"बाबूजी, आपका बेटा हार रहा है?"
नहीं, आप टूट जाएँगे।
आपने तो मुझे पहाड़ बनना सिखाया था,
पर पहाड़ को भी तो बादल चाहिए बरसने के लिए।
माँ जब कहती है — "बेटा, ध्यान रखना अपना",
गला भर आता है मेरा।
जी करता है कह दूँ — "माँ, अब तुम रख लो ध्यान,
मैं थक गया हूँ 'ज़िम्मेदार' बनते-बनते।"
पर कह नहीं पाता,
माँ को कमज़ोर नहीं देख सकता।
बाबूजी, आपने ये तो कभी बताया ही नहीं,
कि मर्द होने का मतलब हर बार जीतना नहीं,
कभी हारकर किसी कंधे पर सिर रख देना भी होता है।
मेरा कंधा तो सबका तकिया है,
पर मेरे सिर के लिए तकिया कहाँ है?
सुनो दुनिया वालो, बस इतना ही कहना है:
जब कोई पुरुष चुप हो जाए,
तो ये मत समझना वो हार गया।
हो सकता है वो ऐसी जंग लड़ रहा हो,
जो तुम्हें दिखती ही नहीं।
उसे "तुम तो स्ट्रॉन्ग हो" मत कहो,
कभी कह दो — "आज तुम कमज़ोर पड़ सकते हो, मैं हूँ न।"
यकीन मानो, उस दिन एक पुरुष नहीं,
एक पूरी पीढ़ी चैन से सो जाएगी।
क्योंकि पुरुष भी इंसान है बाबूजी,
उसे भी दर्द होता है, वो भी थकता है,
उसे भी कभी-कभी बस "माँ" चाहिए होती है।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा,अरेराज, पूर्वी चम्पारण ( बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







