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Dr fauzia Naseem shad
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16 Jun 2026 · 2 min read
"उम्मीद”, जिसे हम आस, आशा, ख़्वाहिश, अपेक्षा, भरोसा आदि अनेक
“उम्मीद”, जिसे हम आस, आशा, ख़्वाहिश, अपेक्षा, भरोसा आदि अनेक नामों से जानते हैं दरअसल वह एक खूबसूरत एहसास है, जो न केवल हमारी ज़िंदगी में रंग भरता है, बल्कि कठिन से कठिन रास्तों को भी आसान बना देता है। उम्मीद हो, तो सब कुछ मुमकिन है। उम्मीद के बिना ज़िंदगी की कल्पना अधूरी है। यह हमें जीने का हौसला देती है, नामुमकिन को मुमकिन करने की ताक़त देती है।उम्मीद हमारे हौसलों को पंख देती है और उड़ना सिखाती है। इसी उम्मीद की ताक़त से हम हर मुश्किल को पार कर जाते हैं। कहते हैं, “उम्मीद पर दुनिया कायम है”, और यह सच है उम्मीद के सहारे हम दुनिया को जीत सकते हैं। वहीं इसके टूट जाने पर हम दुनिया से नहीं, खुद से भी हार जाते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि हम कभी अपनी उम्मीद को मरने न दें। हमारी उम्मीद का उजाला ही हमारी नाउम्मीदी के अंधेरों को मिटा सकता है। उम्मीद कभी हम खुद से करते हैं, तो कभी दूसरों से। लेकिन दूसरों से उम्मीद रखना अक्सर हमें मायूस कर देता है। जब कोई अपना हमारी उम्मीद तोड़ता है, तो दिल में बेयक़ीनी घर कर जाती है, और हमारा भरोसा इतना टूटता है कि फिर न किसी से उम्मीद कर पाते हैं, न यक़ीन। कुछ लोग तो टूटती उम्मीदों के बोझ तले अपनी ज़िंदगी तक हार जाते हैं। इसलिए ज़रूरी है उम्मीद हमेशा खुद से और अपने रब से रखें। क्योंकि रब ही वह सहारा है जो कभी नाउम्मीद नहीं करता। हमें दूसरों से उम्मीद रखने से पहले यह देख लेना चाहिए कि क्या वे हमारी उम्मीदों पर खरा उतरने लायक हैं भी या नहीं। बे’एतबार लोगों से उम्मीद रखना, बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं। उम्मीद का टूटना कितना तकलीफ़देह होता है यह वही जानता है जिसकी उम्मीद टूटी होती है। इसलिए हर किसी को यह कोशिश करनी चाहिए कि किसी की उम्मीद कभी हमसे न टूटे।माना कि ज़िंदगी में हमेशा वैसा नहीं होता जैसा हम उम्मीद करते हैं —लेकिन यह ज़िंदगी है, यहाँ कोई चीज़ मुकम्मल नहीं। हर उम्मीद पूरी हो, यह ज़रूरी नहीं पर जब तक साँस चल रही है, उम्मीद का दामन कभी मत छोड़िए। “एक दिन सब ठीक हो जाएगा” —यह लफ़्ज़ ही अंधेरे में चमकती उम्मीद की रोशनी है,जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। याद रखिए — दूसरों से उम्मीदें महज़ अपनी खुशी के लिए पालना कभी-कभी दुख की वजह बन जाता है। इसलिए उम्मीदें मुख़्तसर रखें, सधी हुई रखें। उम्मीद टूट भी जाती है, फिर भी कहीं न कहीं से रोशनी देती है।यह हमारे ज़िंदा होने की सबसे पहली शर्त है।और हमारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सहारा भी।इसलिए अपनी उम्मीद को कभी भी, किसी भी कीमत पर, ख़त्म न होने दें।
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद


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