"व्याकरण की वीणा"
अक्षर से शब्द बना, शब्दों से वाक्य,
वाक्य से बनती है भाषा की नाव।
बिना पतवार के डूब जाए अर्थ,
व्याकरण ही देता है उसे ठांव।
"संज्ञा" है नाम सबका, नदी पर्वत गाँव,
"सर्वनाम" आया बीच में, कहा "मैं" और "तुम" और "वह"।
"विशेषण" ने रूप सजाए, काला, गोरा, ऊँचा, नीचा,
"क्रिया" दौड़ी मैदान में, लिखा, पढ़ा, गाया, बहा।
"कारक" हैं रिश्ते शब्दों के, कौन किससे जुड़ा,
कर्ता करे काम, कर्म सह ले पीड़ा।
"काल" बताए बीता, आज, या आने वाला,
"वचन" बताए एक है या समूह उजाला।
"विलोम" लड़ते आपस में, रात और दिन,
"पर्यायवाची" मिलकर रहते, जैसे जल और नीर।
"समास" में शब्द जुड़ें, राजपुत्र, नीलकमल,
"अलंकार" पहनाएं उसे, "उपमा" और "अनुप्रास" का।
"विराम चिन्ह" हैं साँसें भाषा की, "अल्पविराम", "पूर्णविराम",
बिना इनके अर्थ भटके, जैसे बिना दिशा के जहाज।
"प्रश्नचिन्ह" पूछे, "विस्मय" बोले, "योजक" जोड़े हाथ,
व्याकरण ने हर भाव को दिया अपना एक साथ।
"मुहावरे" हैं अनुभव की बोली, "आँखों में धूल झोंकना",
"लोकोक्तियाँ" हैं बड़ों की सीख, "नाच न आवे आंगन टेढ़ा"।
इनसे सजी है हिंदी, चौपाल से दरबार तक,
बिना इनके भाषा लगे, जैसे फूल बिना खुशबू का।
"तत्सम", "तद्भव", "देशज", "विदेशज" शब्दों का परिवार,
संस्कृत से लेकर अंग्रेजी तक, सबका है अधिकार।
पर मूल में बसी है गंगा, हिंदी की मिठास,
व्याकरण ने ही बचाई इसकी पहचान खास।
"रस" हैं भावों की धारा, "श्रृंगार", "करुण", "वीर",
पढ़ने वाले का दिल रोए, या हो जाए गंभीर।
"छंद" हैं लय की डोरी, "दोहा", "चौपाई", "सोरठा",
बिना लय के शब्द रूखे, लय से बनें मीठा।
"निबंध" जोड़े विचार, "पत्र" जोड़े नाता,
"कहानी" सिखाए जीवन, "कविता" मन को भाता।
व्याकरण है इन सबकी माँ, जो सबको राह दिखाए,
शुद्ध शब्द, शुद्ध अर्थ, शुद्ध भाव जगाए।
व्याकरण नहीं है बंधन, ये तो अनुशासन है,
जैसे तारों को बांधे संगीत का आलाप।
बिना व्याकरण के भाषा भटके,
व्याकरण से ही शब्दों को मिले माप।
इसलिए हिंदी की इज्जत रखना,
शुद्ध बोलना, शुद्ध लिखना।
क्योंकि शब्दों की आत्मा है व्याकरण,
और व्याकरण से ही बनती है कविता।
रचनाकार — पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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