Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

जाग गया है भारत

जाग गया है भारत अब, आँखों से पर्दा हटा,
सच को सच कहने का साहस, हर दिल में फिर से जगा।

डर के आगे झुकना कैसा, प्रश्न करना अधिकार है,
जनता ही लोकतंत्र की शक्ति, जनता ही सरकार है।

वादों की चमक नहीं अब, काम का होगा हिसाब,
खाली भाषण नहीं चलेंगे, माँगा जाएगा जवाब।

जाति-धर्म की आग से ऊपर, रोटी-रोज़ी की बात,
शिक्षा, पानी, स्वास्थ्य पर अब, होगी खुलकर मुलाकात।

जिसके हाथों सत्ता होगी, उससे प्रश्न भी होंगे,
जनता के हर छोटे दुख पर, उसके उत्तर भी होंगे।

जाग गया है भारत अब, बातों से बहलेगा नहीं,
जो सच होगा सामने, उससे मुँह मोड़ेगा नहीं।

मंदिर-मस्जिद अपनी जगह हैं, उनका भी सम्मान रहे,
पर भूखे बच्चे की आँखों में, पहले खुशियों का जहान रहे।

सड़क, अस्पताल, विद्यालय का अब होगा हर ज़िक्र,
किसने क्या वादा पूरा किया, जनता रखेगी फ़िक्र।

हाथ जोड़कर वोट तो माँगो, पर उत्तर भी देना होगा,
जनता के विश्वास का तुमको, मूल्य चुकाना होगा।

अब नारे से पेट न भरता, यह सच सबने जान लिया,
कागज़ वाले सपनों से भी, मन ने रिश्ता तोड़ लिया।

अब प्रश्न किसी चेहरे से नहीं, व्यवस्था से होंगे,
क्यों कुछ घर महलों जैसे हैं, कुछ छप्पर भी रोते होंगे?

क्यों खेतों में पसीना बहता, फिर भी कर्ज़ किसान का है,
क्यों रोटी उगाने वाला ही, सबसे अधिक परेशान सा है?

क्यों शिक्षा अब बाज़ार बनी, क्यों ज्ञान बिकाऊ होता है,
क्यों प्रतिभा की राहों में भी, अक्सर पैसा होता है?

क्यों सच बोलने वाला इंसां, बार-बार ठुकराया जाए,
और झूठ के ऊँचे मंचों पर, हर दिन ताज सजाया जाए?

जाग गया है भारत अब, केवल सत्ता बदलने को नहीं,
सोच की जंग लड़ने को जागा है, किसी से डरने को नहीं।

अब नागरिक समझ गया है, लोकतंत्र का अर्थ क्या है,
पाँच साल में एक वोट नहीं, हर दिन की जिम्मेदारी क्या है।

जो कुर्सी पर बैठा होगा, वह सेवक कहलाएगा,
जनता की आँखों से बचकर, अब कोई न निकल पाएगा।

जो कल तक चुप बैठा था, वह आज कलम उठाएगा,
अपने हक़ की हर चौखट पर, दस्तक देकर आएगा।

जागा है तो जागा ही रहे, फिर नींद न आने पाए,
लोकतंत्र की इस मशाल को, कोई आँधी न बुझाए।

जाग गया है भारत अब, नई सुबह का हुआ विहान,
सही सवाल जो पूछ रहा है, वही है सच्चा नागरिक महान।

क्योंकि राष्ट्र तभी महान बने, जब जनता भी ईमान करे,
अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का सम्मान करे।

जाग गया है भारत अब, यह केवल एक नारा नहीं,
यह सोई हुई आत्मा का स्वर है,
जो कहता है—

“मुझे मत बताओ क्या सोचना है,
मुझे तथ्य दो, मैं स्वयं निर्णय करूँगा।
मैं प्रजा नहीं, नागरिक हूँ;
और अब मैं प्रश्न करूँगा।”

जाग गया है भारत अब,
उसे नारों से नहीं, नतीजों से मतलब है।

उसे यह नहीं जानना कि दोषी कौन था,
उसे यह जानना है कि सुधार कौन करेगा।

वह अब तालियाँ बजाने नहीं निकला,
वह हिसाब माँगने निकला है।

वह पूछ रहा है—

अगर देश आगे बढ़ रहा है,
तो पीछे छूटता कौन जा रहा है?

अगर विकास इतना हुआ है,
तो उम्मीद से भरी आँखों में इतना डर क्यों है?

अगर सच इतना मजबूत है,
तो सवालों से घबराहट क्यों है?

जाग गया है भारत अब,
वह समझ गया है कि
अंधभक्ति और देशभक्ति में उतना ही अंतर है,
जितना दर्पण और तस्वीर में।

दर्पण सच दिखाता है,
तस्वीर केवल वही दिखाती है जो दिखाना चाहती है।

वह समझ गया है कि
सत्ता चाहे किसी की भी हो,
प्रश्नों का अधिकार जनता का ही रहता है।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद
राजा का नहीं,
जागरूक नागरिक का होता है।

अब भारत पूछेगा—
क्यों किसी माँ को अस्पताल के दरवाज़े पर
अपने बच्चे को खोना पड़ता है?

क्यों किसी किसान को
अपनी मेहनत का मूल्य माँगना पड़ता है?

क्यों किसी युवा को डिग्री के बाद भी
मौकों के लिए भटकना पड़ता है?

और वह यह प्रश्न नफ़रत से नहीं,
ज़िम्मेदारी से पूछेगा।

क्योंकि जागा हुआ समाज
तोड़ता नहीं,जोड़ता है।

वह जानता है कि
प्रश्न लोकतंत्र के दुश्मन नहीं होते,
वे उसके प्रहरी होते हैं।

और जिस दिन जनता प्रश्न पूछना छोड़ देती है,
उसी दिन सत्ता सुनना छोड़ देती है।

इसलिए भारत जागा है—
किसी को गिराने के लिए नहीं,
सबको जगाने के लिए।

किसी एक विचार की जीत के लिए नहीं,
सत्य की खोज के लिए।

किसी चेहरे के समर्थन या विरोध में नहीं,
अपने भविष्य के पक्ष में।

जाग गया है भारत अब,
और जब नागरिक जाग जाते हैं,
तो इतिहास की दिशा बदल जाती है,

क्योंकि फिर राष्ट्र भीड़ से नहीं,
चेतना से चलता है।

जाग गया है भारत—
अब वह सुनता कम है, समझता ज़्यादा है; मानता कम है, पूछता ज़्यादा है।




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