#एक बार और मयंक..
बत्तीस पार हुई उमर, सपने फिर भी शेष।
थका हुआ तन आज है, मन में बाकी रेश।।
दूर खड़ा परिवार से, आँखों में संसार।
बेटा पूछे फोन पर, “पापा कब आओगे यार”?
नन्ही गुड़िया बोलती, “पापा-पापा”आज।
दो अक्षर में डूबता, मयंक का हर राज।।
पत्नी की वो खामुशी, माँ-बाबा की आस।
सबको अपना मानता, फिर भी सबसे पास!
रिश्तेदार नाराज़ हैं, दोस्त कहें “बड़ा।”
किसको कैसे समझाए मन? अकेलापन है खड़ा।
चार दिवारी मौन है, मन में लाख सवाल।
बाहर दुनिया जीतता, भीतर अपना हाल।।
कभी कहता मन छोड़ दे, अब बस बहुत हुआ।
फिर जिम्मेदारी कह उठे, चल अभी क्या हुआ?
पेट की खातिर नौकरी, सपनों की खातिर दूर।
अपनों की खातिर सह रहा, मन का हर दस्तूर।।
हार नहीं स्वीकार है, चाहे जितनी रात।
एक बार फिर कोशिश कर, मयंक बदलेंगे हालात !
बच्चों का बचपन न मिले, लौट समय की चाल।
आज भले ही दूर हैं, कल हो अपना हाल।।
एक पिता की आस है, एक घर की पुकार।
मयंक लौटे एक दिन, लेकर खुशियों की बहार।।
रचनाकार :- डॉ. मयंकेश कुमार दुबे(शिक्षक एवं लेखक)
एम.ए. इतिहास(गोल्ड मेडलिस्ट )
औलेंडा,आगरा, उत्तर प्रदेश
मो. :-8630291252, 8979776231


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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