"शादी की सुई पर अटकी ज़िंदगी"
जब देखो, तब ज़िंदगी शादी की सुई पर ही अटक जाती है,
हर चौपाल, हर फोन, हर मिलने पर बस एक ही बात दोहराई जाती है,
हर रिश्तेदार की आँख में वही पुराना सवाल चुभता है —
"बिटिया, शादी कब करोगी? अब तो उम्र निकल रही है।"
क्यों जीवन की हर गली इसी चौखट पर आकर रुक जाती है?
क्या मेरी उम्र का पैमाना सिर्फ़ फेरों से नापा जाएगा?
क्या मेरे ख्वाबों की कीमत बस मेहंदी के रंग से तौली जाएगी?
जीवन में शादी ही क्यों ज़रूरी है?
क्या बिना वरमाला के मेरी पहचान अधूरी है?
मेरे भीतर भी तो एक आसमान पलता है,
जिसमें उड़ने के हज़ार बहाने पलते हैं।
शादी के अलावा भी तो कुछ सपने होते हैं,
जिन्हें पूरा करना होता है।
किसी पहाड़ की चोटी पर अपना नाम लिखना है,
अधूरी कविता को मुकम्मल कर दुनिया को सुनाना है।
अपनी मेहनत की कमाई से माँ-पापा को हँसाना है,
बिना सहारे के अपने पैरों पर खड़ा होना है।
मैं करियर के शिखर परचम लहराना चाहती हूँ,
किताबों की दुनिया में अपना एक घर बनाना चाहती हूँ।
अपने नाम की एक पहचान, बिना किसी सरनेम के,
इतिहास के पन्नों पर खुद अपनी कलम से लिखना चाहती हूँ।
मैं कोई साड़ी नहीं जिसे सुई पर टाँक दिया जाए,
मैं धूप हूँ — फैलूँगी, जलूँगी, चमकूँगी।
शादी एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं,
पहले खुद को तो पूरा जी लूँ।
फिर चाहूँ तो किसी का हाथ थाम लूँ,
पर उससे पहले खुद अपना हाथ थामना ज़रूरी है।
क्योंकि सपने भी तो शादी की तरह पवित्र होते हैं,
और हर लड़की का पहला ब्याह खुद से होना चाहिए।
मेरी उड़ान को मंगलसूत्र की डोर से मत बाँधो,
मेरी हँसी को विदाई के गीतों में मत तोलो।
मुझे पहले खुद की परछाई से इश्क़ करने दो,
फिर दुनिया जिस रिश्ते में चाहे, मुझे बाँध ले।
रचनाकार — पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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